दिल्ली के प्रमुख हाईवे प्रोजेक्ट्स में कंपेंसेटरी वनरोपण को लेकर बड़ी खामी उजागर हुई है। विकास कार्यों के लिए सालों से पेड़ काटे जाते रहे हैं, लेकिन उनका बदला देने के लिए लगाए जाने वाले पेड़ों का काम पर्याप्त नहीं हो रहा। पिछले हफ्ते नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने दिल्ली सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक में UER-2 और द्वारका एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट्स के लिए लाखों पेड़ लगाने में गंभीर कमी पाई।
UER-2: तीसरी रिंग रोड पर पेड़ों का हिसाब अधूरा
UER-2, जिसे दिल्ली की तीसरी रिंग रोड भी कहा जाता है, उत्तर दिल्ली के NH-44 (बंकौली-अलीपुर के बीच) से शुरू होकर बवाना इंडस्ट्रियल एरिया, रोहिणी, मुंडका, बकरवाला और नजफगढ़ से गुजरता है। यह द्वारका एक्सप्रेसवे से जुड़कर दिल्ली एयरपोर्ट के शिव मूर्ति जंक्शन पर NH-48 पर समाप्त होता है। UER-2 के दिल्ली वाले हिस्से का 17 अगस्त 2025 को रोहिणी में उद्घाटन किया गया था।
एनएचएआई ने 2021 में दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) को 64,080 पेड़ लगाने के लिए 55.10 करोड़ रुपये जमा कराए थे। डीडीए ने अगस्त 2024 में दावा किया कि 57,280 पेड़ लगा दिए गए, लेकिन साइट जांच में केवल 24,887 पेड़ ही मौजूद पाए गए। यानी आधे से ज्यादा पेड़ गायब हैं। इस मुद्दे को फरवरी 2025 में चीफ सेक्रेटरी स्तर पर और जून 2025 में केंद्रीय सड़क मंत्री के साथ बैठक में उठाया गया। दिसंबर 2025 में दिल्ली मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली बैठक में भी डीडीए को काम तेज करने के निर्देश दिए गए, लेकिन अब तक कोई सुधार नहीं हुआ है।
द्वारका एक्सप्रेसवे: ट्रैफिक कम हुआ, लेकिन हरियाली का नुकसान
यह 29 किमी लंबा एक्सप्रेसवे दिल्ली-गुरुग्राम के बीच NH-48 पर ट्रैफिक की भीड़ कम करने के लिए बनाया गया। इसके तहत 1,53,990 पेड़ लगाने थे और एनएचएआई ने 2020 में DDA को 87.77 करोड़ रुपये दिए। DDA ने अगस्त 2024 में दावा किया कि 1,51,452 पेड़ लगा दिए गए, लेकिन संयुक्त जांच में केवल आधे पेड़ ही पाए गए। यह मामला भी चीफ सेक्रेटरी और मुख्यमंत्री स्तर पर उठाया गया। पहले भी कई बैठकों में इसे लेकर चर्चा हुई, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
पर्यावरण एक्सपर्ट्स की चेतावनी
पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन कंधारी का कहना है कि कागज पर पेड़ लगाने और जमीन पर उनके न मिलने की समस्या सिस्टम की गहरी खामी को दर्शाती है। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ बॉक्स टिक करने का खेल नहीं है। इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, सही उपकरण, स्पष्ट नियम और लगातार निगरानी जरूरी है।” उन्होंने बताया कि CAMPA जैसे ढांचे में थर्ड-पार्टी जांच और आधिकारिक निरीक्षण का प्रावधान है, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधन कम हैं, प्रशिक्षण नहीं है और जियो-टैगिंग जैसे टूल्स की कमी है। भवरीन कंधारी ने सुझाव दिया कि स्टाफ की संख्या बढ़ाना, तकनीकी प्रशिक्षण देना और मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना जरूरी है, ताकि ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स में पेड़ों के वादे सिर्फ कागज पर न रह जाएं।
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