शारदीय नवरात्र विशेष : पी रंजन दास, बीजापुर. शारदीय नवरात्रि के मौके पर जगराता, गरबा के साथ बीजापुर में बतुकम्मा लोकपर्व भी आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. दरअसल यह पर्व तेलंगाना की संस्कृति और परम्परा को दर्शाता है. तेलंगाना की सीमा से सटे होने और रोटी बेटी के रिश्ते के चलते बीजापुर क्षेत्र में भी यह पर्व प्रचलित है.

बतुकम्मा लोकपर्व में स्त्री को मान्यता दिया गया है. ये स्त्री के सम्मान में मनाया जाने वाला त्यौहार है. इस दिन महिलाएं फूलों के सात परत बनाकर उसमें गोपुरम मंदिर की आकृति बनाती है और उसकी पूजा करती है. यह पूजा महालय अमावस्या में मनाया जाता है.
कवि एवं साहित्यकार बीराराज बाबू के अनुसार बतुकम्मा तेलगू शब्द है, जिसका संधि विच्छेद बतकू + अम्मा होता है. बतकू का अर्थ जीवन तथा अम्मा का मतलब माँ होता है. जीवन देने वाली माँ ही बतकम्मा है.

बीजापुर जिला तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमा से लगा होने के कारण वहां के तीज-त्यौहार को बीजापुर में भी अब प्रमुखता से मनाया जाने लगा है. बतकम्मा का त्यौहार तेलंगाना का प्रमुख पर्व है, जिसे शारदीय नवरात्र में आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या से आरम्भ से कुल 9 दिनों तक धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

अब यह त्यौहार बीजापुर जिले की संस्कृति बन गई है. यह पर्व विशेष रूप से सभी वर्ग की महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, जिसे बच्चे से लेकर वृद्ध तक अपने-अपने पारा मोहल्ला या किसी सार्वजनिक स्थल पर समूह में एकत्रित होकर तुलसी के पौधे के साथ गौरम्मा (गौरी माता) की स्थापना कर पूजा किया जाता है.

महिलाएं भोर मे उठकर अनेक प्रकार के फूल तोड़कर लाते हैं और उपवास रहकर उनकी माला बनाते हैं. एक प्लेट या परात में फूलों की मालाओं को उनके आकार के अनुसार बड़े से छोटे क्रम में शंकु के आकार में सजाया जाता है. मालाओं से सजाने के दौरान अंदरुनी भाग जिसे गोपुरम कहते हैं उसमें सेम, तोरई व अन्य पत्तियों से भर दिया जाता है, ताकि मालाएं एक दूसरे से जुड़ी रहे.

सबसे ऊपरी भाग में अंतिम छोटी माला के बीच जो खाली जगह होती है उसे कद्दू के पीले फूल को रखा जाता है, जिसका मध्य भाग उभरा होने के कारण शंकु के आकार को पूर्णता मिलती है और यह ही “बतकम्मा” कहलाता है. संध्याकाल में नौ दिन महिलाएं बतकम्मा को निर्धारित स्थल पर गौरम्मा या तुलसी पौधे के गोल रखकर घेरे में कतारबद्ध होकर गीत गाते व दोनों हाथों से ताली बजाते हुए नृत्य करते हैं. प्रत्येक गीत में कोई भी एक महिला प्रमुख रूप से गीत गाती हैं और शेष कोरस देते हुए ताली बजाते हैं.

भौंरे, तितलियां आदि फूलों के रस चूसने के कारण पहले दिवस को एंगली फूल (झूठे फूल) कहते हैं. आठवें दिवस में विराम होता है, ताकी अंतिम दिन अधिक से अधिक फूल मिल सके व बड़ा बतकम्मा बना सके, जिसे अररेम कहते हैं. अंतिम दिन में बडे से बड़ा बतकम्मा बनाकर मनाते हैं और आधी रात या सुबह तक बतकम्मा के गीतों को गाते हुए व रिकारडेड गानों की धुन पर नाचते हैं.

प्रतिदिन की तरह ग्राम की सुख, शांति व बरकत की प्रार्थना के साथ तालाब, नदी या नाले में विसर्जित किया जाता है व प्रसाद वितरण किया जाता है. इस पर्व में बस्तर के गोंचा पर्व की तरह लड़के महिलाओं को गोंचा से मारते हैं, इसे तेलगू में पापडी गोंटम कहते हैं.

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