एक ऐसा स्कूल जहां के बच्चे दिव्यांग मास्टर को देते हैं भगवान का दर्जा,घोड़े पर सवार दुर्गम रास्तों को पारकर पहुंचते हैं स्कूल, पढ़िए पूरी कहानी…

डिंडोरी। भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता है. क्योंकि एक गुरु ही है जो छात्र का भविष्य बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है. गुरू को शास्त्रों में ब्रह्मा की उपमा दी गई है. आज हम जिस गुरूजी की बात हम कर रहे हैं उनका शिक्षा के प्रति समर्पण काबिले-तारीफ है.मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य डिंडोरी जिले के संझौला टोला स्कूल के मास्टर रतनलाल नंदा की कहानी को सुनकर आपको विश्वास हो जाएगा कि ये छात्रों के लिए भगवान से कम नहीं हैं. रतनलाल नंदा पैर से दिव्यांग है. जो धुर जंगली इलाके के संझौला टोला गांव के मास्टर हैं. शिक्षा की अलख जगाने के लिए तमाम तरह की कठिनाईयों का सामना करते हुए ये हर रोज संझौला टोला स्कूल पढ़ाने के लिए पहुंचते हैं.

दरअसल शिक्षक रतनलाल नंदा जन्म से ही पैर से दिवायंग है. और वो डिंडोरी जिला मुखायलय से करीब 20 किलोमीटर दूर लुढरा गांव के निवासी हैं. गांव से सात किलोमीटर दूर प्राथमिक शाला संझौला टोला में वे पदस्थ हैं. रतनलाल नंदा की जिस गांव में पोस्टिंग हुई है वो गांव पूरी तरह जंगलो से घिरा हुआ है. इस गांव तक पहुंचने के लिए आवागमन करी कोई सुविधा नहीं है . बारिश के मौसम में तो यहां पहुंचना और भी ज्यादा मुश्किल भरा काम है.

ऐसे में नंदलाल ने परेशानियों का सामना करते हुए अपनी सैलरी से एक घोड़ा खरीदा जिस पर सवार होकर ऊबड़-खाबड़ रास्ते और नदी-नालों को पार करते हुए हर रोज समय पर स्कूल पहुंच जाते हैं.

खास बात ये भी है कि मास्टर साहब का पढ़ाने का अंदाज बच्चों को खूब रास आता है पढ़ाने में अव्वल और कर्तव्य के प्रति दीवानगी का पाठ कोई रतन लाल नंदा से सीखें….

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