धर्मग्रंथों में व्रत को तप का सरल और प्रभावी रूप माना गया है. व्रत केवल भोजन त्यागना नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म को शुद्ध रखने का संकल्प भी है. हमारे ऋषि-मुनियों ने व्रत को आत्मशुद्धि, संकल्प शक्ति की दृढ़ता और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बताया है. इसे लेकर धर्मग्रंथों में भी बताया गया है. धर्म सिंधु में कहा गया है कि व्रत करते समय शुद्ध बहुत जरूरी है. गरुड़ पुराण में सत्य बोलने और क्रोध से दूर रहने की सलाह दी गई है.

मनुस्मृति के अनुसार हिंसा, झूठ, चोरी या चुगली व्रत को भंग कर देती हैं. स्कंद पुराण में व्रत के दिन एक समय भोजन या फलाहार करने का उल्लेख मिलता है. पद्म पुराण में संकल्प, पूजा-विधि और मंत्र-जाप के महत्व का वर्णन है. श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत ही आध्यात्मिक लाभ और मनोकामना पूर्ति का कारण बनता है.
मुख्य नियम और सावधानियां
- व्रत के दिन बार-बार अन्न या फलाहार करना उचित नहीं माना जाता. सामान्यतः एक या दो बार फलाहार पर्याप्त माना गया है. दिन में सोने से बचना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार इससे व्रत का पुण्यफल कम हो जाता है.
- व्रत के समय कम बोलना और अधिकतर मौन रहना श्रेष्ठ माना गया है, इससे मन जप और ध्यान में एकाग्र रहता है.
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, सुपारी व दक्षिणा लेकर संकल्प करें.
- व्रत के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह और आलस्य से दूर रहना चाहिए. झूठ बोलने या किसी की निंदा-चुगली करने से भी बचें.
- शिव-पार्वती से जुड़े व्रतों में भगवान शिव को बिल्वपत्र, धतूरा, चंदन और पुष्प अर्पित किए जाते हैं, जबकि मां गौरी को श्रृंगार अर्पित करने की परंपरा है.
- यदि व्रत किसी निश्चित अवधि के लिए किया गया हो, तो उसके पूर्ण होने पर उद्यापन करना आवश्यक माना गया है.
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