परीक्षार्थियों में आत्मविश्वास जगाने वाला महामंत्र है रामचरितमानस के सुंदरकांड की चौपाई
“कवन सो काज कठिन जग माहीं…”
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।”

इस चौपाई में जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्तियों का स्मरण कराया था और यही चौपाई परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के परिपेक्ष्य में भी उतनी ही सही और प्रेरणादायी है। इसका संदेश ही अपनी शक्ति को पहचानने पर आधारित है। इस चौपाई का अर्थ बात ही सरल है कि“हे तात,इस संसार में ऐसा कौन-सा काम है जो आपके लिए असंभव हो?” विद्यार्थियों के लिए भी यही संदेश है कि दुनिया में कोई भी परीक्षा इतनी कठिन नहीं जिसे दृढ़ संकल्प और परिश्रम से पार न की जा सके।अक्सर परीक्षा के दिनों में छात्र-छात्राएं व्यथित और घबराए हुए रहते हैं। विद्यार्थियों को लगता है कि सिलेबस बहुत बड़ा है, समय कम है, प्रतिस्पर्धा अधिक है।ऐसे समय विद्यर्थीयों की मन: स्थिति ठीक उसी प्रकार होती है जैसे समुद्र को देखकर वानर सेना चिंतित थी परंतु जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। आज भी विद्यार्थी के जीवन में उनको प्रेरणा, आत्मबल और भरोसा दिलाने वाले “जामवंत” अलग-अलग रूप में उनके साथ हैं माता-पिता, गुरुजन, प्रेरक पुस्तक और स्वयं का आत्मविश्वास उनके जामवन्त हैं।


गहरे चिंतन के बाद महसूस होता है सुंदरकांड का प्रसंग और परीक्षा का संदर्भ कई मायनों में एक तरह के हैं। सुंदरकांड में लंका जाने की बात पर मौन रहने वाले हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध नहीं था। अपनी क्षमताओं को कम आँकने वाले, दूसरों से अपने तुलना करने वाले और आत्मविश्वास खो चुके विद्यार्थी ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन जैसे ही जामवंत ने हनुमान को उनकी सामर्थ्य का स्मरण कराया हनुमान जी का स्वरूप पर्वताकार हो गया।इसका अर्थ यही होता है कि जब आप आत्मविश्वास से भर जाते हैं तब आपकी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

सच्चाई तो यह है कि परीक्षा कोई दंड नहीं बल्कि स्वयं को साबित करने की एक कला है।परीक्षा हमारी तैयारी, अनुशासन और धैर्य का मापक यंत्र है। समुद्र लांघते समय हनुमान जी के समक्ष मैनाक पर्वत ने विश्राम का प्रस्ताव दिया, सुरसा ने मार्ग रोका, सिंहिका ने पकड़ने की कोशिश की लेकिन हनुमान जी ने हर चुनौती को बुद्धि और साहस से पार किया।वैसे ही इम्तिहान की राह में विद्यार्थियों के जीवन में भी अनेक बाधाएँ आती हैं—मोबाइल का आकर्षण,आलस्य का आमंत्रण,सोशल मीडिया का निमंत्रण और असफलता का डर परंतु जो विद्यार्थी इन बाधाओं को पहचानकर संयम से आगे बढ़ता है वही सफलता का सेतु पार कर पाता है। इस चौपाई में आस्था के संदेश के साथ आत्मबल का सूत्र भी छिपा है। हनुमान जी में तीन विशेषताएँ थीं—असीम शक्ति, अद्भुत बुद्धिमत्ता और श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति। विद्यार्थियों के लिए इसी के समकक्ष ये तीन गुण इस प्रकार हैं—शारीरिक और मानसिक ऊर्जा (स्वास्थ्य और एकाग्रता), सही रणनीति (टाइम टेबल, रिवीजन, अभ्यास), संकल्प और सकारात्मक सोच यदि छात्र इन तीनों को संतुलित कर लें तो कोई भी बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षा या प्रवेश परीक्षा उनके लिए कठिन नहीं रह जाती। सकारात्मक आत्मसंवाद की शक्ति का चमत्कार सभी विद्यारथीयों को पहचाना चाहिए क्यों कि जब हम कहते हैं “मुझसे नहीं होगा” तब हमारा मन कमजोर हो जाता है। लेकिन जब हम कहते हैं—“मैं कर सकता हूँ” तो हमारा आत्मबल जागृत होता है।जब आप यह मान लेते हैं कि “मैं कर सकता हूँ” तो आप आधी लड़ाई जीत लेते हैं।

बड़ी सफलता के लिए आस्था और अनुशासन का संतुलन बहुत ज़रूरी है। केवल प्रार्थना करने से सफलता नहीं मिलती और केवल पढ़ाई करने से भी मन शांत नहीं रहता इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है।जब मन शांत होगा तभी ज्ञान आत्मसात होगा, परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यर्थीयों को मेरी सलाह है सुबह उठकर 5–10 मिनट ध्यान, प्राणायाम या “ॐ” का उच्चारण मन को स्थिर करता है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि गहरी श्वास लेने से मस्तिष्क में ऑक्सीजन का संचार बढ़ता है और एकाग्रता सुदृढ़ होती है।सुबह हनुमान चालीसा या सुंदरकांड की कम से कम एक चौपाई का स्मरण अवश्य करें। फिर पूरी एकाग्रता से अध्ययन करें।पुरानी मान्यता है कि परीक्षा के दिन घर से निकलते समय माता-पिता का आशीर्वाद लेकर जाना केवल हमारी धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक सहारा भी है क्योंकि आशीर्वाद से आत्मविश्वास बढ़ता है।हमारे ग्रंथों में सरस्वती वंदना का विशेष महत्व बताया गया है। परीक्षा से पहले “या कुन्देन्दुतुषारहारधवला…” जैसे श्लोक के स्मरण या भगवान गणेश की पूजा से मन में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि पूजा-पाठ किसी चमत्कार के लिए नहीं बल्कि मन को दृढ़ बनाए रखने के लिए किया जाता है। क्योंकि सच्चा चमत्कार तो हमारी मेहनत है।

हमारे यहाँ परीक्षा के दिन दही-चीनी खिलाने की परंपरा को शुभ मानने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है — दही पेट को ठंडा रखता है और चीनी से हमें तुरंत ऊर्जा मिलती है। कई परिवारों में परीक्षा के दिन पुस्तक पर तिलक लगाकर पढ़ाई शुरू करने की परम्परा है। यह परम्परा हमें ज्ञान के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है।आध्यात्मिक ऊर्जा मन को स्थिर करती है और पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ाती है। यदि कभी पढ़ाई करते समय मन ऊब जाए तो 10–15 मिनट का ब्रेक लें, हल्की सैर करें या भजन सुन लें। इससे मन पुनः ताजगी महसूस करेगा। पुरानी कहावत है “जैसा अन्न, वैसा मन।” परीक्षा के दिनों में संतुलित भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए क्योंकि अधिक तला-भुना भोजन आलस्य बढ़ाता है। फल, दही, हरी सब्जियाँ और पर्याप्त पानी ऊर्जा बनाए रखते हैं। समय से पहले परीक्षा केंद्र पहुँचें। प्रश्नपत्र को ध्यान से पढ़ें। पहले उन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए जिनमें आप आत्मविश्वास महसूस करते हैं। उत्तर स्पष्ट और साफ लिखें अंतिम 10 मिनट उत्तरपुस्तिका की जाँच अवश्य करें। याद रखिए घबराहट में की गई गलती आपकी पर मेहनत पर पानी फेर सकती है। किसी परीक्षा में अपेक्षित अंक न मिलें तो निराश होने की क़तई आवश्यकता नही है। क्योंकि महान शक्तिशाली हनुमान जी भी पहली बार में सीधा सीता माता तक नहीं पहुँच पाए थे। उन्हें लंका में खोज करनी पड़ी, चुनौतियों से जूझना पड़ा। असफलता अंत नहीं है, बल्कि सुधार का पहला संकेत है। अपनी गलतियों का विश्लेषण करें कमजोर विषयों पर काम करें और नियमित अभ्यास करें। सफलता केवल अंकों से नहीं मापी जाती बल्कि चरित्र, अनुशासन और निरंतर प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।याद रखें परीक्षा जीवन का एक छोटा हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं।

परीक्षा में वांछित सफलता के लिए छोटे लक्ष्य बनाएं – एक साथ पूरा सिलेबस न सोचें। रिवीजन को प्राथमिकता दें – इस बात को समझें कि पढ़ना जितना जरूरी है, दोहराना उससे ज्यादा जरूरी है। मॉक टेस्ट देकर समय प्रबंधन सीखें। पर्याप्त नींद लेते हुए अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। नकारात्मक लोगों से दूरी बनाते हुए सकारात्मक संगति रखें । हनुमान जी से सीखने योग्य गुण हैं निःस्वार्थ सेवा, विनम्रता, साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प, जब भी मन घबराए, यह चौपाई दोहराएँ— “कवन सो काज कठिन जग माहीं,
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।” उठिए, जागिए, पढ़िए—सफलता आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

समाचार चैनल के सलाहकार सम्पादक होने के नाते मेरा ये व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है कि जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है, समय भी उसी का सम्मान करता है। हमारी भारतीय संस्कृति में पढ़ाई को साधना के रूप में देखा जाता है और विद्यार्थी को “विद्या का साधक” कहा जाता है।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा है कि परीक्षा को बोझ नहीं, उत्सव समझिए। उनके प्रसिद्ध कार्यक्रम परीक्षा पे चर्चा में वे विद्यार्थियों को तनावमुक्त होकर परीक्षा देने की प्रेरणा देते हैं।उनका कहना है कि दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय स्वयं से प्रतिस्पर्धा कीजिए। हर दिन स्वयं से पूछिए कि “क्या मैं कल से बेहतर हूँ?” देश के प्रधानमंत्री ने विद्यारथीयों के माता-पिता को भी सलाह दी है कि बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें। किसी से तुलना करना बच्चों का मनोबल गिराता है। इतना विश्वास कीजिए कि हर बच्चा अद्वितीय है, उसकी प्रतिभा भी अनूठी है।

याद रखिए परीक्षा का परिणाम आपकी पहचान नहीं बल्कि आपका प्रयास आपकी पहचान है। इसलिए मुस्कुराइए, विश्वास रखिए और पूरे मन से परीक्षा दीजिए फिर देखिए सफलता कैसे आपके कदम चूमती है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक (न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम)