बैसाखी का त्योहार इस साल 14 अप्रैल को मनाया जाएगा. वैसे तो ये खेती-किसानी से जुड़ा बड़ा खास दिन होता है, क्योंकि इसी समय रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है. किसान अपनी मेहनत का फल देखकर खुशी से झूम उठते हैं. गांवों में ढोल-नगाड़े बजते हैं, भांगड़ा-गिद्धा होता है और स्वादिष्ट पकवानों का स्वाद लिया जाता है. इस दिन एक और खास बात होती है, सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं. इसलिए इसे सौर नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है.

मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान और सूर्य पूजा करने से पुण्य मिलता है और जीवन में सुख आता है. इस दिन लोग सुबह पवित्र नदी में स्नान करते हैं और पूजा-पाठ में जुट जाते हैं. बैसाखी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि मेहनत, खुशियों और साथ मिलकर जश्न मनाने का दिन है.

धार्मिक नजरिए से भी बैसाखी का अपना अलग ही महत्व है. सिख धर्म में यह दिन इसलिए खास है क्योंकि 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसी दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी. ‘खालसा’ का मतलब होता है शुद्ध और पवित्र. इस कदम का मकसद लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़ा करना और उन्हें साहस, समानता और सेवा का रास्ता दिखाना था. तभी से ये दिन सिख समुदाय के लिए बहुत अहम बन गया. पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में बैसाखी बड़े जोश के साथ मनाई जाती है. लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं, साथ में नाचते-गाते हैं और खुशियां शेयर करते हैं. गुरुद्वारों में जाकर कीर्तन होता है, गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया जाता है और लंगर सेवा में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.