Bastar News Update: दंतेवाड़ा। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब बदलाव की नई कहानी लिखी जा रही है। आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें स्थायी जीवन देने की दिशा में प्रशासन ने ठोस पहल शुरू की है। गीदम विकासखंड के झोडियाबाड़म में पुनर्वास के लिए एक मॉडल कॉलोनी विकसित की जा रही है, जहां करीब 11 हेक्टेयर भूमि पर पक्के मकानों के साथ पूरी बस्ती बसाई जाएगी।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 38 परिवारों को घर स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से 20 मकानों का निर्माण तेजी से चल रहा है। इस कॉलोनी में सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जाएंगे। अब तक बैरकों में रहने को मजबूर इन परिवारों को पहली बार अपने घर में रहने का अवसर मिलेगा, जिससे उनके जीवन में स्थायित्व आएगा।

प्रशासन का मानना है कि यह पहल केवल आवास उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वास बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम है। आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को राशन कार्ड, आधार, मनरेगा, आयुष्मान और कौशल विकास योजनाओं से जोड़ा जा रहा है। साथ ही मुर्गी पालन, बकरी पालन और अन्य स्वरोजगार के माध्यम से उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

यह मॉडल अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास का नया उदाहरण बनकर उभर रहा है और इसे अन्य जिलों में भी लागू करने की तैयारी है। यह पहल दिखाती है कि विकास और विश्वास के जरिए ही स्थायी शांति का रास्ता तैयार किया जा सकता है।

जगदलपुर में शहीद स्मारक से छेड़छाड़ पर बवाल, कांग्रेस का विरोध तेज

जगदलपुर। झीरम घाटी शहीद स्मारक में तोड़फोड़ और शहीद नेताओं की तस्वीरों से छेड़छाड़ की घटना के बाद शहर का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। घटना की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे, जहां उन्होंने स्मारक की साफ-सफाई कर क्षतिग्रस्त तस्वीरों को सम्मानपूर्वक पुनः व्यवस्थित किया।

इसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ता दरभा थाने पहुंचे और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए एफआईआर दर्ज कराई। कांग्रेस नेताओं ने इस घटना को शहीदों के सम्मान के साथ खिलवाड़ बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि ऐसी घटनाएं किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।

नेताओं ने प्रशासन से जल्द आरोपियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की मांग की है। घटना के बाद क्षेत्र में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है और मामला तूल पकड़ता नजर आ रहा है। वहीं, शहीद स्मारक जैसे संवेदनशील स्थल पर हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस मामले में प्रशासन की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

बस्तर में एंबुलेंस व्यवस्था में बड़ा बदलाव, हर जिले में ‘चलती-फिरती ICU’ की सुविधा

बस्तर। संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए एंबुलेंस व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब हर जिले में एडवांस लाइफ सपोर्ट (ALS) की दो-दो एंबुलेंस तैनात की जाएंगी, जिससे आपात स्थिति में मरीजों को तेजी से बेहतर इलाज मिल सकेगा।

अब तक प्रत्येक जिले में केवल एक ALS एंबुलेंस होने से इमरजेंसी में दिक्कतें आती थीं, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद रिस्पॉन्स टाइम में सुधार होगा। पूरे बस्तर संभाग में अब कुल 69 एंबुलेंस संचालित होंगी, जिनमें ALS और बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) दोनों शामिल हैं।

इन सेवाओं का संचालन फिर से जीवीके कंपनी को सौंपा गया है, जो आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन के जरिए व्यवस्था को सुदृढ़ करेगी। ALS एंबुलेंस को ‘चलती-फिरती ICU’ माना जाता है, जिसमें वेंटिलेटर, कार्डियक मॉनिटर और प्रशिक्षित स्टाफ मौजूद रहता है, जिससे मौके पर ही मरीज का प्राथमिक उपचार संभव हो पाता है।

इस सुविधा का सबसे अधिक लाभ दूरस्थ और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को मिलेगा, जहां अस्पताल तक पहुंचने में समय लगता है। 24 घंटे, तीन शिफ्ट में सेवाएं संचालित होंगी, जिससे हर समय आपातकालीन सहायता उपलब्ध रहेगी।

नई व्यवस्था से प्राइवेट एंबुलेंस की मनमानी पर भी रोक लगेगी और मरीजों को सस्ती व बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ‘गोल्डन ऑवर’ में यह सुविधा कई जिंदगियां बचाने में अहम भूमिका निभाएगी। यह बदलाव बस्तर में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है।

दंतेवाड़ा में फ्लोरोसिस पर स्वास्थ्य विभाग की पहल, 190 बच्चों की जांच में 40 प्रभावित मिले

दंतेवाड़ा। जिले के फ्लोरोसिस प्रभावित घोड़ागांव में स्वास्थ्य विभाग ने जागरूकता और उपचार के लिए विशेष पहल करते हुए एक दिवसीय हेल्थ कैंप का आयोजन किया। राष्ट्रीय फ्लोरोसिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत आयोजित इस शिविर में स्कूली बच्चों की विशेष स्वास्थ्य जांच की गई।

कुल 190 बच्चों के परीक्षण में 40 बच्चे फ्लोरोसिस से प्रभावित पाए गए, जिससे क्षेत्र में बीमारी की गंभीरता उजागर हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों को फ्लोरोसिस के लक्षण, कारण और बचाव के उपायों की जानकारी दी। साथ ही स्वच्छ पेयजल, संतुलित आहार और दंत स्वच्छता के महत्व पर जोर दिया गया।

इस अभियान में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग की संयुक्त भागीदारी रही, जिससे जागरूकता का दायरा बढ़ा। अधिकारियों का कहना है कि नियमित स्क्रीनिंग और समय पर उपचार से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोरोसिस जैसी समस्याओं से निपटने के लिए इस तरह के शिविरों को बेहद जरूरी माना जा रहा है। यह पहल न केवल उपचार, बल्कि जागरूकता के जरिए बीमारी को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

टेंट कारोबारी ने रिटायर्ड अफसर से की 9.5 लाख की ठगी, आरोपी गिरफ्तार

जगदलपुर। शहर में ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक टेंट कारोबारी ने अपने ही परिचित और सेवानिवृत्त अधिकारी को निशाना बनाकर लाखों रुपये ठग लिए। आरोपी ने खुद को एसीबी और ईओडब्ल्यू का अधिकारी बताकर पहले पीड़ित को डराया और फिर मामला खत्म कराने के नाम पर रकम वसूल ली।

जानकारी के अनुसार, पीड़ित को अज्ञात नंबरों से कॉल कर शिकायत का डर दिखाया गया। घबराकर उसने अपने परिचित धर्मेंद्र चौहान से मदद मांगी। आरोपी ने भरोसा जीतते हुए खुद ही मामले की जांच करने का दावा किया और व्हाट्सएप के जरिए फर्जी दस्तावेज भेजकर दबाव बनाया। इसके बाद उसने मामला निपटाने के लिए 10 लाख रुपये की मांग की और पीड़ित से 9.5 लाख रुपये ले लिए।

बाद में मामला संदिग्ध लगने पर पीड़ित ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने आरोपी का मोबाइल भी जब्त कर लिया है और मामले की जांच जारी है।

यह घटना बताती है कि पहचान और डर के आधार पर ठगी के नए तरीके सामने आ रहे हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल या दबाव में आकर पैसे न दें और संदिग्ध मामलों की तुरंत सूचना पुलिस को दें।

दंतेवाड़ा के ‘वीआईपी’ गांव में विकास की पोल—20 साल से टूटी पुलिया, रस्सी के सहारे जान जोखिम में डालते ग्रामीण

दंतेवाड़ा। जिले के गदापाल गांव में विकास के दावों की हकीकत सामने आ रही है। बड़े नेताओं से जुड़ा माना जाने वाला यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। गांव के पटेल पारा को जोड़ने वाली पुलिया पिछले 20 वर्षों से जर्जर हालत में पड़ी है और अब पूरी तरह टूट चुकी है।

बताया जा रहा है कि करीब 20 साल पहले बनी यह पुलिया निर्माण के एक महीने के भीतर ही ढह गई थी। इसके बाद कई सरकारें बदलीं, योजनाएं आईं, लेकिन पुलिया का दोबारा निर्माण नहीं हो सका। हालात यह हैं कि खासकर बरसात के मौसम में ग्रामीणों को उफनते नाले को पार करने के लिए रस्सी का सहारा लेना पड़ता है, जिससे हर वक्त हादसे का खतरा बना रहता है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने इस ओर कभी गंभीरता नहीं दिखाई। वहीं पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारी भी इस मामले में स्पष्ट जवाब देने से बच रहे हैं और उनका कहना है कि इस पुलिया से संबंधित कोई फाइल रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है।

यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि विकास के दावों पर भी सवाल खड़े करती है। अब ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और वे जल्द स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।

कोंडागांव में बदली तस्वीर: 15 साल बाद गांव लौटा परिवार, नक्सलियों के डर से छोड़ा था घर

कोंडागांव। जिले में नक्सल प्रभाव कम होने के साथ अब गांवों में सामान्य जीवन लौटता नजर आ रहा है। इसका उदाहरण कटियाराम नाग का परिवार है, जो 15 साल बाद अपने गांव तुमड़ीवाल वापस लौटा है। नक्सलियों के भय और शक के कारण परिवार को वर्षों पहले गांव छोड़कर नारायणपुर में मजदूरी कर जीवन यापन करना पड़ा था।

कठिन परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने हिम्मत नहीं हारी और बच्चों की परवरिश के साथ उनकी शादी भी कराई, लेकिन अपने गांव लौटने की इच्छा हमेशा बनी रही। अब क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल बनने के बाद परिवार ने फिर से अपने घर की ओर रुख किया है।

प्रशासन इसे नक्सल उन्मूलन अभियान की बड़ी सफलता मान रहा है। कलेक्टर के अनुसार, जब कोई विस्थापित परिवार अपने गांव लौटता है, तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। वहीं पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से लोगों में विश्वास बढ़ा है।

सुकमा जेल निरीक्षण में नाबालिगों को लेकर सख्ती, संदिग्ध मामला चिन्हित

सुकमा। जिले में जेल निरीक्षण के दौरान नाबालिग बंदियों को लेकर प्रशासन की सख्ती सामने आई है। निरीक्षण के दौरान एक संदिग्ध प्रकरण चिन्हित होने के बाद तत्काल कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

अधिकारियों ने बंदियों से सीधे संवाद कर उनकी उम्र और दस्तावेजों की जांच की, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बंदी नाबालिग पाया जाता है, तो उसे तुरंत बाल संप्रेक्षण गृह भेजा जाएगा।

यह निरीक्षण उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत गठित समिति द्वारा किया गया, जिसमें विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल थे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी स्थिति में जेल में न रखा जाए।

जिला प्रशासन ने नाबालिगों के अधिकारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए सख्त निगरानी और नियमित निरीक्षण जारी रखने की बात कही है।

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