बस्तर। देश के सबसे बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में इस बार एक अलग स्थिति देखने को मिल रही है। करीब दो दशक में पहली बार ऐसा लग रहा है कि नक्सली अपने अहम सैन्य अभियान TCOC (Tactical Counter Offensive Campaign) की शुरुआत तय समय पर नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर यह अभियान हर साल 8 मार्च के बाद शुरू होकर जून तक चलता है, जिसका उद्देश्य सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करना और बस्तर जैसे क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाना होता है। यह अभियान उनके गुरिल्ला युद्ध का हिस्सा है, जिसमें वे सूखे और पतझड़ के मौसम का फायदा उठाते हैं। लेकिन इस बार शुरुआती दिनों में किसी बड़ी गतिविधि के संकेत नहीं मिले हैं।
बता दें कि सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सल संगठन पर बढ़ते दबाव और कमजोर होती संरचना का परिणाम मान रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लगातार चलाए गए ऑपरेशन में कई बड़े कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इसके साथ ही जंगलों में नए सुरक्षा कैंप, सड़कों का तेजी से विस्तार और ड्रोन सर्विलांस ने नक्सलियों की गतिविधियों को काफी सीमित कर दिया है।

सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों के खौफ से अब नक्सली बड़ी संख्या में एकत्र होकर रणनीति बनाने में भी मुश्किल महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बड़े हमलों की योजना बनाना उनके लिए पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं। आशंका है कि नक्सली छोटे या मध्यम स्तर के हमलों के जरिए अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। इसे देखते हुए बस्तर संभाग के सभी जिलों में सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। यदि इस साल भी टीसीओसी प्रभावी रूप से शुरू नहीं हो पाता, तो यह नक्सली आंदोलन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका साबित हो सकता है।
गर्मी बढ़ते ही ‘आग का अलर्ट’, चार दिनों में 13 जगह लगी आग
जगदलपुर। जगदलपुर में मार्च की शुरुआत के साथ ही बढ़ती गर्मी और सूखे पत्तों के कारण आग लगने की घटनाएं तेजी से सामने आ रही हैं। पिछले चार दिनों में शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में आग लगने की 13 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे प्रशासन और अग्निशमन विभाग अलर्ट मोड में आ गया है।
जानकारी के अनुसार आरापुर में नीलगिरी प्लांट और डूंगरीगुड़ा की झाड़ियों में आग लगने की घटनाओं ने सबसे पहले चिंता बढ़ाई। इसके बाद मालगांव में पैरावट (फसल अवशेष) के ढेर में लगी आग ने विकराल रूप ले लिया। सूचना मिलते ही अग्निशमन दल मौके पर पहुंचा और कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाकर बड़ी जन-धन हानि को टाल दिया। वहीं पंडरीपानी और परपा थाना क्षेत्र की झाड़ियों में लगी आग को भी समय रहते बुझा लिया गया।
इस बीच होली के दिन भी चार अलग-अलग स्थानों पर आग लगने की घटनाएं सामने आईं। घाट कवाली, कलचा के जंगलों और महकापाल में आग बुझाने के लिए फायर टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी। इसी दौरान कुम्हारपारा एयरपोर्ट के सामने चलती बाइक में भी अचानक आग लग गई, जिसे अग्निशमन दल ने तुरंत काबू में कर लिया।
अगले दिन करकापाल और सरगीपाल के जंगलों में भी आग फैलने लगी थी, लेकिन समय रहते उसे नियंत्रित कर लिया गया। अग्निशमन विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे सूखी झाड़ियों और पैरावट के ढेर में आग न लगाएं, क्योंकि गर्मी के मौसम में इससे बड़ी आग की घटनाएं हो सकती हैं।
ई-केवाईसी में सुस्ती से प्रभावित हो रही राशन व्यवस्था
बस्तर। जिले में सरकारी राशन प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए राशन कार्ड के हर सदस्य का e-KYC (Electronic Know Your Customer) अनिवार्य किया गया है। लेकिन जिले में यह प्रक्रिया अब भी धीमी गति से आगे बढ़ रही है।
जिले में राशन कार्ड में 8 लाख 29 हजार से अधिक सदस्य दर्ज हैं, जिनमें से 92 हजार से ज्यादा सदस्यों का ई-केवाईसी अभी भी लंबित है। कई बार समय सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।
इसका सीधा असर राशन वितरण व्यवस्था पर पड़ रहा है। ई-केवाईसी नहीं होने की वजह से कई परिवारों को मिलने वाला राशन बंद हो गया है। सबसे ज्यादा परेशानी एपीएल कार्डधारियों को हो रही है। नियम के अनुसार यदि एपीएल कार्ड में एक भी सदस्य का ई-केवाईसी नहीं हुआ, तो पूरे परिवार को राशन नहीं मिल पाएगा।
आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में जहां करीब 73 हजार क्विंटल चावल का आवंटन हुआ था, वहीं मार्च में यह घटकर लगभग 71 हजार क्विंटल रह गया है। अधिकारियों का कहना है कि जिन लाभार्थियों का ई-केवाईसी बाकी है, वे जल्द से जल्द यह प्रक्रिया पूरी करें, ताकि राशन वितरण में किसी तरह की बाधा न आए।
नवरात्र से पहले दंतेश्वरी मंदिर में मनोकामना ज्योत महंगी
जगदलपुर। जगदलपुर के आस्था केंद्र माँ दंतेश्वरी मंदिर में चैत्र नवरात्र से पहले मनोकामना ज्योत के शुल्क में बढ़ोतरी कर दी गई है। मंदिर समिति के निर्णय के अनुसार अब श्रद्धालुओं को तेल की ज्योत के लिए 751 रुपये और घी की ज्योत के लिए 1751 रुपये का शुल्क देना होगा। इससे पहले तेल की ज्योत का शुल्क 701 रुपये और घी की ज्योत का शुल्क 1651 रुपये निर्धारित था।
मंदिर समिति का कहना है कि बढ़ती व्यवस्थागत लागत, पुजारियों के मानदेय में वृद्धि और मंदिर परिसर की साफ-सफाई, दीप व्यवस्था तथा धार्मिक आयोजनों के खर्च को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
इस वर्ष चैत्र नवरात्र का पर्व 19 मार्च से 27 मार्च तक मनाया जाएगा। नवरात्र के दौरान मंदिर में लगभग 4 हजार मनोकामना ज्योत प्रज्ज्वलित करने का लक्ष्य रखा गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस बार ज्योत प्रज्ज्वलन के लिए ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था भी शुरू की गई है।
इसके अलावा नवरात्र पर्व के दौरान मावली मंदिर में भी मनोकामना ज्योत जलाने की परंपरा निभाई जाएगी। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दरबार में दीप जलाकर अपनी मनोकामना पूर्ण होने की कामना करते हैं।
कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल की फीस पर मंथन, 7 दिन में मांगी गई रिपोर्ट
जगदलपुर। जगदलपुर के कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल की सेवाओं और उपचार दरों को लेकर एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक में अस्पताल प्रबंधन और गवर्निंग बॉडी के बीच एमओयू (MOU) तथा उपचार शुल्क से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
बैठक के दौरान मेडिकल कॉलेज के डीन ने अस्पताल प्रबंधन को 7 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज की दरें, बीमा कार्डधारकों से ली जाने वाली फीस और सामान्य मरीजों से वसूले जाने वाले शुल्क की पूरी जानकारी शामिल करनी होगी।
गवर्निंग बॉडी इन आंकड़ों के आधार पर अस्पताल में उपचार की नई दरें तय करेगी। अधिकारियों का कहना है कि शुल्क निर्धारित करते समय मरीजों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि इलाज के नाम पर मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
गौरतलब है कि अस्पताल की फीस को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं। ऐसे में अब गवर्निंग बॉडी के फैसले पर मरीजों और आम लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं।
मलेरिया से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल कार्यशाला
जगदलपुर। बस्तर संभाग में मलेरिया की चुनौती से निपटने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। 7 मार्च को होने वाले इस कार्यक्रम में देशभर के वरिष्ठ चिकित्सक और विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। यह कार्यशाला एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया और शासकीय मेडिकल कॉलेज जगदलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मलेरिया के बदलते स्वरूप, जटिल मामलों की पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों के बारे में चिकित्सकों को अपडेट करना है। विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर क्षेत्र में मलेरिया, विशेष रूप से फैल्सीफेरम मलेरिया के मामले अधिक देखने को मिलते हैं, जो गंभीर रूप ले सकते हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि कई बार बिना स्पष्ट लक्षण वाले मलेरिया और दस्त के मरीजों में भी मलेरिया के संकेत मिलते हैं, जो चिंता का विषय है। कार्यशाला में मलेरिया की एपिडेमियोलॉजी, आधुनिक जांच तकनीक, समय पर निदान और गंभीर मरीजों के उपचार पर विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे।
देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञ अपने शोध और अनुभव साझा करेंगे। इस पहल से बस्तर के डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों को मलेरिया प्रबंधन की आधुनिक पद्धतियों को समझने और मरीजों के बेहतर उपचार में मदद मिलेगी।
11 साल से बांस की आपूर्ति बंद, मजबूरी में जंगल से काट रहे ग्रामीण
बस्तर। बस्तर संभाग में पारंपरिक बांस शिल्प से जुड़े ग्रामीणों की आजीविका संकट में पड़ती नजर आ रही है। सरकारी योजना के तहत बंसोड़ समुदाय को रियायती दर पर बांस उपलब्ध कराया जाना था, लेकिन पिछले 11 वर्षों से यह व्यवस्था धरातल पर लागू नहीं हो पाई है।
स्थिति यह है कि टोकरी और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने वाले कारीगरों को अब मजबूरी में जंगल से बांस काटकर लाना पड़ रहा है। वहीं वन विभाग इसे अवैध मानते हुए कई मामलों में ग्रामीणों पर जुर्माना भी लगा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग बांस उपलब्ध नहीं करा पा रहा है, तो कम से कम सीमित मात्रा में बांस काटने की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि उनका पारंपरिक रोजगार जारी रह सके। वनांचल क्षेत्रों में खास तौर पर धुर्वा आदिवासी समुदाय के लोग इस शिल्प से जुड़े हुए हैं।
कच्चे बांस से बनने वाली टोकरी और अन्य सामान स्थानीय बाजारों में बिकते हैं, जिससे ग्रामीणों की रोजी-रोटी चलती है। लेकिन बांस की कमी के कारण उनका पारंपरिक रोजगार प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि बंसोड़ समुदाय के लिए बांस उपलब्ध कराने की योजना को जल्द शुरू किया जाए, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित रह सके।
संकटग्रस्त महिलाओं के लिए सहारा बना ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’
जगदलपुर। जगदलपुर में संचालित ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’ संकट में घिरी महिलाओं के लिए सुरक्षा और सहायता का अहम केंद्र बनकर उभरा है। 31 जनवरी 2026 से शुरू हुई इस सेवा के तहत अब तक 1862 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 1849 मामलों का समाधान कर पीड़ित महिलाओं को राहत दिलाई गई है।
केंद्र की सबसे महत्वपूर्ण सुविधा अस्थायी सुरक्षित आश्रय है। घर या समाज में खुद को असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं को यहां सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था दी जाती है। अब तक 763 महिलाओं को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया जा चुका है।
इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) भी महिलाओं के लिए बड़ी मदद साबित हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक 1225 महिलाओं की काउंसलिंग की गई है, जिससे वे मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव से बाहर निकलने में सफल रही हैं।
जिला महिला संरक्षण अधिकारी के अनुसार घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवाद से जूझ रही महिलाओं के लिए भावनात्मक सहारा बेहद जरूरी होता है। यही कारण है कि यह केंद्र अब महिलाओं के लिए सुरक्षा, न्याय और आत्मविश्वास की नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H

