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पं. वैभव बेमेतरिहा

बस्तर आदिम युग से वर्तमान दौर तक हमेशा मनमोहक, आकर्षक, सुंदर और रमणीय रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर बस्तर देश-दुनिया की जरूरतों की पूर्ति का केन्द्र रहा है। साथ ही केन्द्र रहा है बस्तर भोले-भाले आदिवासियों के शोषण, अत्याचार का।
अंग्रेज शासन काल से बस्तर को आबाद करने की कोशिश में जिस तरीके से बर्बाद करने की साजिश हुई वो आज के इस लोकतंत्र शाही दौर में भी जारी है। गैरों के साथ-साथ बस्तर को उसके अपनों ने भी खूब लूटा है। जल-जंगल-जमीन को हड़पने के साथ-साथ बस्तर के मूलनिवासियों को खूब शारीरिक प्रताड़ना झेलना पड़ा है। और आज भी यहां के मूलनिवासी शारीरिक प्रताड़ना झेल रहे हैं।

अंग्रेजों के अत्यचार के खिलाफ तब भी आदिवासियों ने विद्रोह किया था, जब अंग्रेज गए तो सरकारी तंत्र ने अत्याचार किया तो राजा प्रवीर चंद भंजेदव आदिवासियों के साथ लड़े थे। एक दौर भूमकाल का था, एक दौर भंजदेव के वक्त था और एक दौर आज का है। संघर्ष तब भी थे, संघर्ष अब भी है। बस्तर पर हक किसका है ? बस्तर के मूलनिवासियों का या बस्तर के भीतर घुस आए घुसपैठियों का। इसे लेकर ढाई सौ साल से युद्ध चल रहा है।

बस्तर ने अपने भीतर असहनीय दर्द को समेटे रखा है। बस्तर के हर हिस्से में पीड़ा है। जो बस्तर को बस्तर की नजर से देखेगा, जो बस्तर को बस्तरिहों की नजर से देखगा, जो बस्तर को मूलनिवासियों की नजर से देखेगा। बस्तर हुबहू उसे वैसा ही दिखेगा। उसे महसूस होगा बस्तर का दर्द, वह अनुभव करेगा आदिवासियों की स्थिति, वह जान पाएगा बस्तर के भीतर छुपे बस्तर का सच।

सच ये है कि बस्तर में विकास की अवधारणा कभी बस्तरिहों की हिसाब से बनी ही नहीं, कभी जनजातियों को मुख्यधारा मानकर उनके हिसाब से विकास किया ही नहीं गया। हमेशा बस यही कहा जाता रहा जनजातियों को विकास की मुख्यधारा में लेकर आएंगे। सवाल ये कभी ये क्यों नहीं हुआ कि आदिवासियों को ही मुख्यधारा मानकर विकास उनके हिसाब से होता।

दरअसल हुआ ये है कि बस्तर से निकले नेता, जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद, मंत्री हर किसी ने सत्ता में रहकर वहीं किया जो सत्ता चाहती रही है। कभी ये नहीं किया जो आदिवासी चाहते हैं। लोकतंत्र के हम शहरी मानसिकता वाले सत्ताधारियों ने अपनी सोच, अपने हिसाब से ही विकास के पैमाने तय किए।

हमने जिस जमीन से खनिज संपदा का दोहन किया वहां के मूलनिवासियों से कभी पूछा ही नहीं कि वे अपनी जमीन पर क्या चाहते हैं? हमने कभी ये नहीं पूछा कि विकास के मॉडल वे किस रूप में चाहते हैं ?  हमने कभी ये नहीं पूछा कि उन्हें खदान चाहिए या नहीं, उन्हें प्लांट चाहिए या नहीं ? हम बिना इजाजत जोर- जर्बदस्ती कर उनके ऊपर शहरी सत्ता के विकास लिए सबकुछ थोपते चले गए।

यही वजह है कि उस इलाके में आदिवासियों के हितैषी बनकर अलग-अलग समूहों के कुछ क्रांतिकारी आतंकी रूप में परिवर्तित हो गए। चुंकि वे पहले आदिवासियों के हक में लड़े, उनके शोषण के खिलाफ लड़े, उनके रक्षक बनकर शहरी सत्ता से संघर्ष करने लगे। लिहाजा उन्हें आदिवासियों के बीच पनपने का मौका मिलते चला गया। और हम शहरी सत्ता में बैठें लोग कभी आदिवासियों के बीच नक्सलियों के खिलाफ विश्वास को जीत ही नहीं पाए।

यही वजह है कि ढाई सौ साल बाद भी बस्तर के भीतर संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। आज ये संघर्ष पूरी तरह से हिंसात्मक हो चुका है। आदिवासियों के हितैषी बनकर जो आए थे वह गृह युद्ध की भूमिका में है। निशाने पर आज बस्तरिहा भी है और बस्तर की सुरक्षा में लगे हजारों जवान भी।

वैसे इस सवाल को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि बस्तर के भीतर इतने बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों? इस सवाल का जवाब सत्ता में बैठें लोगों से नहीं बल्कि उन आदिवासियों से लिया जाना चाहिए जिनकी सुरक्षा में जवान तैनात है। क्या आदिवासियों को सचमुच सुरक्षाबलों की जरूरत है ? या फिर हमने ही अपने विकास के लिए जबर्दस्ती उनके गाँव-घर में सुरक्षा बलों को भेज दिया है।

बस्तर के भीतर जो हलात है उस पर गंभीरता से चिंतन-मंथन और विश्लेषण होना चाहिए। विश्लेषण होना चाहिए कि आदिवासियों को सबसे ज्यादा खतरा किससे है? आखिर आदिवासियों की सोच के हिसाब से हम विकास क्यों नहीं गढ़ रहे हैं ? शासन के भीतर हम मूलनिवासियों को क्या उनके हक और अधिकार की बातें रखने का पर्याप्त और उचित अवसर दे रहे हैं?

बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और अंतागढ़ से विधायक भोजराज नाग पूरी तरह से बस्तरिहा है। उन्हें देखकर ही हम बस्तर की सादगी और अच्छाई का अंदाजा लगा सकते हैं। भोजराज नाग बस्तरिहों के हितों की बात करते हैं। लोक सुराज अभियान के दौरान भोजराज नाग अधिकारियों पर खूब भड़के। उन्होंने कहा कि अधिकारी आदिवासियों को प्रताड़ित कर रहे हैं। भोजराज ने वही कहा जो उन्होंने देखा है। लेकिन इसका ये आशाय कतई नहीं कि आदिवासी नक्सली प्रताड़ना का शिकार नहीं हो रहे हैं। नक्सलियों के निशाने पर सरकार तो यही है, वे निर्दोष आदिवासियों पर भी क्रुर अत्याचार कर रहे हैं। कहने का मतलब ये है कि आदिवासी तंत्र और आतंक के बीच पीस रहे हैं।

अब सवाल उस सवाल को लेकर जो सोशल मीडिया के इस दौर में अभिव्यक्ति की आजादी बनकर जमकर उठ रहे हैं। या कहिए उठाए जा रहे हैं। फिर चाहे वह आम व्यक्ति हो या शासन-प्रशासन के भीतर काम-काज करने वालें खास व्यक्ति। अगर कोई बस्तर की सच्चाई लिख दे तो वह निशाने पर क्यों है? क्या बस्तर के दर्द को लिखना गुनाह है ?

डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने बस्तर के दर्द को ही तो बयां की थी। फिर इसे लेकर विवाद क्यों?  इसका मतलब तो ये हुआ कि सरकारी तंत्र में शामिल होने के बाद आप अभिव्यक्त होने का अधिकार ही खो देते हैं। अगर ऐसा है तो अब सरकारी नौकरी का विज्ञापन निकालते वक्त बड़े-बड़े और साफ-साफ अक्षरों में यह लिखा होना चाहिए कि नौकरी के दौरान आप अपनी निजी जिंदगी में किसी का दर्द नहीं लिखेंगे, किसी की समस्याओं को अभिव्यक्त नहीं करेंगे।

वैसे वर्षा डोंगरे ही नहीं, बल्कि उनके जैसे कई ऐसे अधिकारी और कर्मचारी अगर किसी सच को लिखते है तो वे तत्काल प्रशासन और फिर शासन के निशाने पर आ जाते हैं। जैसे सीमा पर तैनात जवान तेजबहादुर को अपने भीतर के सिस्टम की सच्चाई को सामने लाने पर बर्खास्त कर दिया गया।

ऐसे में सवाल ये कि क्या वर्षा डोंगरे के खिलाफ जांच के बाद कोई कार्रवाई कर दी जाएगी? या संवेदनशील सरकार का तमगा लेकर गाँव-गाँव धूप में घुमने वाले मुखिया ये कहेंगे कि हर किसी को अभिव्यक्त होने का अधिकार है। फिर चाहे वह सरकार की नीतियों को लेकर आलोचना ही क्यों ना करे।

सरकार को ऐसे सवालों का सामना करना चाहिए उससे घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार सिर्फ चंद लोगों के लिए नहीं होती सरकार तो हर जनता के लिए होती है। सरकार को चुनने का अधिकार अगर जनता को है, तो सरकार के खिलाफ बोलने या उनकी नीतियों की आलोचना करने का अधिकार भी है। और इस अधिकार के दायरे में मेरे जैसे आम आदमी भी है और वर्षा डोंगरे जैसी साहसी अधिकारी भी। क्योंकि लोकतंत्र में मैं भी मतदाता हूँ और वर्षा डोंगरे भी मतदाता है।

खैर अंत उस सवाल के साथ जिसके आधार पर यह बातें लिखी गई है। साहब जी! क्या हम बस्तर का दर्द नहीं लिख सकते ?