बेगूसराय। जिले का मटिहानी गांव अपनी 150 साल पुरानी अनूठी परंपरा के लिए चर्चा में है। जहां आधुनिकता के दौर में कुएं लुप्त हो रहे हैं, वहीं यहां के ग्रामीण 8 कुओं को केंद्र बनाकर दो दिवसीय ‘रंग डालो प्रतियोगिता’ का आयोजन करते हैं। यह होली ब्रज की लठमार होली की तरह ही प्रसिद्ध हो चुकी है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
कुओं पर जुटता है पूरा गांव
परंपरा के अनुसार, होली के पहले दिन ग्रामीण पांच कुओं के पास जमा होते हैं, जबकि दूसरे दिन तीन कुओं पर मुकाबला होता है। पहले रंगों को सीधे कुओं में घोला जाता था, लेकिन अब चंडिका स्थान और ठाकुरबाड़ी जैसे प्रमुख स्थलों पर बड़े-बड़े ‘नाद’ (मिट्टी/सीमेंट के पात्र) और ड्रमों में प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं। पूरा गांव दो खेमों में बंटकर इस अद्भुत उत्सव का हिस्सा बनता है।
साइकिल पंप वाली अनोखी पिचकारी
इस प्रतियोगिता की सबसे बड़ी खासियत इसकी विशाल पिचकारियां हैं। बाजार की पिचकारियां यहां की धार के सामने बौनी साबित होती हैं। ग्रामीण खुद साइकिल के टायर में हवा भरने वाले पंप और बांस से शक्तिशाली पिचकारियां तैयार करते हैं। इनका प्रेशर इतना तेज होता है कि इन्हें चलाने के लिए खास कौशल और ताकत की जरूरत होती है।
हार-जीत का फैसला और सामाजिक एकता
मुकाबले में जो टीम विरोधी पक्ष को रंग की धार से पीछे हटने पर मजबूर कर देती है, उसे विजेता माना जाता है। गांव के बुजुर्ग और महिलाएं निर्णायक की भूमिका निभाते हैं। बेहतर तालमेल दिखाने वालों को पुरस्कार में नई पिचकारियां दी जाती हैं।
150 साल पुराना राजस्थानी कनेक्शन
बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा 150 वर्ष पहले राजस्थान से आए एक मारवाड़ परिवार ने शुरू की थी। हालांकि वह परिवार अब गांव में नहीं है, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई यह विरासत आज भी जीवंत है। गांव से बाहर रहने वाले लोग भी इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए घर लौट आते हैं, जो आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक है।
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