Lalluram Desk. 6 मार्च, शुक्रवार को भालचंद्र संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन कई महत्वपूर्ण योग और नक्षत्र बन रहे हैं। जिनका संबंध पूजा-पाठ और व्रत से जुड़ी मान्यताओं से माना जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की पूजा करते हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं।

पूजा का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, 6 मार्च को पूरे दिन और पूरी रात के बाद अगले दिन सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक वृद्धि योग रहेगा। शुक्रवार सुबह 9 बजकर 30 मिनट तक हस्त नक्षत्र रहेगा, इसके बाद चित्रा नक्षत्र लग जाएगा। तिथि की बात करें तो 6 मार्च को शाम 5 बजकर 53 मिनट तक तृतीया तिथि रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि शुरू होगी।

दृक पंचांग के अनुसार, चैत्र कृष्ण चतुर्थी तिथि की शुरुआत 6 मार्च, शुक्रवार को शाम 5 बजकर 53 मिनट से होगी और इसका समापन 7 मार्च, शनिवार को शाम 7 बजकर 17 मिनट पर होगा। संकष्टी चतुर्थी व्रत में यह नियम है कि चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान होनी चाहिए, क्योंकि व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है।

चंद्र दर्शन का समय

6 मार्च की रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि रहेगी, इसलिए व्रत 6 मार्च को ही रखा जाएगा। संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा रहती है, क्योंकि इसी के बाद व्रत का पारण किया जाता है। 6 मार्च को चंद्रोदय रात 9 बजकर 14 मिनट होगा। कुछ पंचांगों के अनुसार चांद लगभग 9 बजकर 31 मिनट पर दिखाई देना शुरू हो सकता है।

पूजा विधि

संकष्टी चतुर्थी को संकटों को हरने वाली चतुर्थी कहा गया है। इस दिन गणेश जी को दूर्वा चढ़ाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से स्वास्थ्य लाभ और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

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