दिल्ली हाईकोर्ट(Delhi High Court) ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों के चलते अलग रह रही पत्नी को पति की मौत के बाद फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक पति-पत्नी के बीच कानूनी तौर पर तलाक नहीं हो जाता, तब तक पत्नी पति की मृत्यु के बाद मिलने वाले हर लाभ की हकदार होगी। हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के आदेश को रद्द कर दिया। कैट ने पहले सरकार को महिला को फैमिली पेंशन जारी करने का निर्देश तो दिया था, लेकिन उसे पति की मौत की तारीख से बकाया देने से इनकार कर दिया था। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि केवल इसलिए कि महिला ने फैमिली पेंशन के लिए आवेदन करने में देरी की, उसे उसके वैध अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
1 अगस्त को जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा “यह तथ्य कि याचिकाकर्ता (पत्नी) ने मृतक से भरण-पोषण की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया था, यह दर्शाता है कि याचिकाकर्ता और मृतक पति के बीच कुछ वैवाहिक विवाद थे। इसीलिए, जब तक तलाक न हो जाए, याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता था।”
कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ विवाद या अलगाव पत्नी को उसके वैध अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। जब तक तलाक का डिक्री नहीं हो, पत्नी पति की मृत्यु के बाद मिलने वाली पेंशन और अन्य लाभ पाने की हकदार है।
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दरअसल, यह मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता महिला के पति की 2009 में मौत हो गई थी, लेकिन उसने 2013 में फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया। कैट ने उसके पक्ष में आदेश दिया, मगर कहा कि उसे बकाया राशि 16 अक्टूबर, 2014 से मिलेगी, यानी जिस तारीख को उसने याचिका दायर की थी।
इस आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसकी दलील थी कि वह मृतक की कानूनी पत्नी है और किसी अन्य व्यक्ति के वैध दावे के अभाव में उसे पति की मृत्यु की तिथि से पेंशन मिलनी चाहिए।
हाईकोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि जब तक पति-पत्नी के बीच कानूनी तौर पर तलाक नहीं होता, तब तक पत्नी को फैमिली पेंशन का अधिकार रहेगा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सिर्फ आवेदन में देरी होने से किसी को वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने कैट का आदेश रद्द करते हुए महिला को सितंबर 2009 से ही फैमिली पेंशन का हकदार माना और सरकार को चार महीने के भीतर बकाया राशि ब्याज सहित चुकाने का निर्देश दिया।
मामले में केंद्र सरकार ने महिला के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक ने अपनी फैमिली मेंबर्स की सूची में उसका नाम शामिल नहीं किया था। सरकार का तर्क था कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय से विवाद था, इसलिए वह लाभ की पात्र नहीं है। हालांकि, महिला ने अदालत में तर्क दिया कि वह कानूनी रूप से मृतक की पत्नी है और किसी अन्य व्यक्ति के वैध दावे के अभाव में उसे फैमिली पेंशन से वंचित करना अनुचित है।
सरकार ने इस मामले में तर्क दिया था कि महिला को अपने पति की मौत की जानकारी तक नहीं थी और उसने काफी देर से पेंशन का दावा किया। इसके साथ ही केंद्र ने यह भी कहा कि मृतक ने अपनी फैमिली मेंबर्स की सूची में पत्नी का नाम दर्ज नहीं किया था। हालांकि, हाईकोर्ट की बेंच ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की “हमें डर है कि उपरोक्त दलीलें याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन पाने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकतीं।”
हाईकोर्ट ने महिला को सितंबर 2009, यानी पति की मौत की तारीख से ही फैमिली पेंशन का हकदार माना। साथ ही सरकार को आदेश दिया कि चार महीने के भीतर ब्याज सहित सभी बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
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