BMC Election Results- 2026: महाराष्ट्र में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) समेत 29 निकाय चुनावों के नतीजे आज शुक्रवार को घोषित हो रहे हैं। 29 में 23 नगर निगमों बीजेपी गठबंधन आगे है। मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक में बीजेपी गठबंधन को बड़ी जीत हासिल की है। एशिया की सबसे अमीर निगर निगम बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन यानी बीएमसी (BMC Election Results ) चुनाव में 30 साल बाद बीजेपी निगम की सत्ता पर काबिज होगी। बीजेपी नेतृत्व वाली महायुति गठबंधन के आगे ‘ठाकरे ब्रदर्स’ (Thackeray brothers) का गेम ओवर हो गया और मुंबई का नया बॉस बीजेपी बन गई है। वहीं ठाकरे ब्रदर्स’ का ‘मराठी मानुस’ वाला एजेंडा को महाराष्ट्र की जनता ने ही नकार दिया और 30 साल तक बीएमसी पर काबिज रहने वाली उद्धव ठाकरे की पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।

227 सीटों वाले बीएमसी चुनाव में बीजेपी 130 सीटों पर कब्जा जमाया। इसी के साथ ही रूझानों में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत (122 सीट) का आंकड़ा पार कर लिया। जबकि बीजेपी गठबंधन की आंधी में ‘ठाकरे ब्रदर्स’ (उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे) का बेड़ा गर्क हो गया है। ठाकरे ब्रदर्स सिर्फ 72 सीटों पर सिमट गई।

राज ठाकरे को साथ लेकर चुनाव लड़ना भी उद्धव ठाकरे के लिए रास नहीं आया। हिंदी-मराठी का एजेंडा चलाने वाले राज ठाकरे को मराठी जनता ने ही जवाब दे दिया। उनके एजेंडे को सिरे से महाराष्ट्र की जनता ने नकार दिया। कुल 2869 वार्डों में से 1553 के रुझान सामने आ चुके हैं। जिसमें बीजेपी को आधे पर बढ़त मिलती दिख रही है। वहीं शिवसेना को जोड़ लिया जाए तो महायुति औसत रूप से दो-तिहाई से ज्‍यादा वार्डों पर काबिज होती सकती है। कुल मिलाकर, नगरीय निकाय के चुनाव नतीजे भी विधानसभा चुनाव नतीजों की राह पर चल रहे हैं और, ‘मराठी मानुस’ को लेकर मचाया गया ठाकरे बंधुओं का शोर वोटरों में अनुसना कर दिया। हम यहां वो 5 कारण को जानने की कोशिश करते हैं, जिसने 20 साल बाद साथ आए दोनों भाइयों की ऐसी दुर्गती कर दी कि राज् की सत्ता के बाद अब निगम की सत्ता से भी दूर हो गएः-

1. ठाकरे ब्रदर्स का ‘मराठी मानुस’ एजेंडा फेल

राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाते समय उम्मीद जगाई थी कि वह शिवसेना का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन सकते हैं। शुरुआती बीएमसी चुनावों में मनसे ने प्रभाव भी दिखाया. लेकिन समय के साथ मनसे की राजनीति इधर-उधर के विचारों से संचालित होने लगी। राज ठाकरे का अवसरवादी रुख (कभी मराठी, कभी हिंदुत्व, कभी भाजपा से नजदीकी) मतदाता को स्थायी भरोसा नहीं दे सका। इसके साथ ही उनके संगठन का विस्तार बहुत कम हो सका। स्थानीय मुद्दों पर स्थिर राजनीति के अभाव में मनसे बीएमसी जैसे चुनावों में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पाई।

 2. कांग्रेस की बजाए राज ठाकरे के साथ गठबंधन रणनीतिक भूल

कई विश्लेषकों ने इसे उद्धव की ‘बड़ी गलती’ बताया. राज ठाकरे की एमएनएस पहले से ही कमजोर थी (पिछले स्थानीय चुनावों में खाता नहीं खोला), और उनके साथ जाने से उद्धव को कोई बड़ा फायदा नहीं हो सकता था। यह सब जानते हुए भी उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस का साथ छोड़कर राज ठाकरे क्यों चुना यह समझ में नहीं आया। राज ठाकरे की एमएनएस का इतिहास उत्तर भारतीय विरोधी रहा है। उनके साथ गठबंधन से मुंबई के उत्तर भारतीय (जो कुल वोटरों का बड़ा हिस्सा हैं) ठाकरे गठबंधन से दूर हो गए और बीजेपी-शिंदे गुट की ओर चले गए।

कांग्रेस के साथ गठबंधन की बजाय एमएनएस को चुनने का नतीजा हुआ कि अल्पसंख्यक वोटों से भी पार्टी हाथ धो बैठी। उद्धव ठाकरे न हिंदुओं के हुए और न ही मुसलमानों के. कांग्रेस मुंबई में ज्यादा प्रभावशाली थी। कांग्रेस के वोट भी शिवसेना यूबीटी को ट्रांसफर होते. जाहिर है कि यदि कांग्रेस के साथ रहते, तो बेहतर प्रदर्शन संभव था। कांग्रेस की तुलना में एमएनएस मुंबई में संगठनात्मक रूप से भी कमजोर थी।

3. मराठी वोटों का विभाजन

ठाकरे बंधुओं ने ‘मराठी मानूस’ पर जोर दिया, और एक्सिस माय इंडिया के अनुसार मराठी वोटरों में उन्हें 49% वोट शेयर मिला है। लेकिन मुंबई में मराठी वोटर कुल 38% हैं, जबकि उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदाय (30-35%) बीजेपी के पक्ष में मजबूत रहे। महायुति ने इन गैर-मराठी वोटों को मजबूती से जोड़ा। ठाकरे गठबंधन का फोकस सिर्फ मराठी पर रह गया, जो अपर्याप्त साबित हुआ। गैर मराठी भाषियों को मराठी बोलने के लिए मजबूर करने की घटनाओं ने उत्तर और दक्षिण भारतीयों को ही नहीं मराठियों को भा नाराज कर दिया।


4. ‘ठाकरे ब्रांड’ का कमजोर होना और जनता से कनेक्ट टूटना

ठाकरे परिवार का ‘ब्रांड’ मुंबई में कभी अजेय था। हालांकि 2022 के शिवसेना विभाजन के बाद यह काफी क्षीण हो गया। उद्धव ठाकरे की पार्टी को चुनाव आयोग ने ‘असली शिवसेना’ नहीं माना, और धनुष-बाण चिन्ह शिंदे गुट को मिला।  ये आम धारणा बन चुकी है कि ठाकरे परिवार आम लोगों से मिलता जुलता नहीं है। जब तक उद्धव ठाकरे सत्ता में थे तो विधायकों तक का उनसे मिलना नहीं होता था। बीजेपी नेताओं और शिंदे सेना के नेताओं का भी आरोप रहा है कि ठाकरे परिवार महाराष्ट्रियों से वैसा कनेक्ट नहीं रखता जैसा पहले था। इसके साथ ही युवा और नई पीढ़ी के मतदाताओं में ‘ठाकरे’ नाम की अपील घटी, जबकि 18-25 आयु वर्ग में बीजेपी को जबरदस्त  समर्थन मिला।

 5. भाजपा का आक्रामक विस्तार और शिंदे सेना को महत्व देना

बीएमसी में ठाकरे बंधुओं की दुर्गति का एक अहम कारण भाजपा का आक्रामक उभार भी है। भाजपा ने पिछले एक दशक में मुंबई में अपना सांगठनिक आधार मजबूत किया।  उत्तर भारतीय मतदाता, गुजराती-बनिया वर्ग और मध्यमवर्गीय हिंदुत्व समर्थक तबका भाजपा के साथ संगठित हुआ। भाजपा ने बीएमसी को मिनी विधानसभा की तरह लड़ा, संसाधनों, प्रचार और नेतृत्व तीनों स्तरों पर बढ़त बनाई।

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