Buddha Purnima 2023 : हममें से बहुत कम लोगों को ही इस बारे में जानकारी होगी कि सत्य और अहिंसा के महान सन्देश वाहक और बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान गौतम बुद्ध भी छत्तीसगढ़ आ चुके हैं. सुप्रसिद्ध कवि, लेखक और अध्येता स्वर्गीय हरि ठाकुर के अनुसार तथागत ने तत्कालीन दक्षिण कोसल नरेश विजयस के आमंत्रण पर राजकीय अतिथि के रूप में तीन माह तक श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर) में निवास किया था.

भगवान बुद्ध ने वहां चौमासा बिताया था. उनके श्रीपुर प्रवास की अवधि को लेकर वर्तमान युग के विद्वानों में मामूली मत-मतांतर हो सकता है, लेकिन विद्वानों के अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि भगवान बुद्ध यहां आए थे.

बलौदाबाजार भाटापारा जिले के ग्राम डमरू में वर्ष 2013 से 2016 के बीच हुए उत्खनन में पुरातत्वविदों ने बौद्ध स्तूप के साथ कुछ आवासीय संरचनाएं और भगवान बुद्ध के ‘चरण चिन्ह’ उत्खनन में प्राप्त किए. यह गांव जिला मुख्यालय बलौदाबाजार से लगभग 16 किलोमीटर पर है. इसे डमरूगढ़ भी कहा जाता है. बताता है कि छत्तीसगढ़ से चीन तक पैदल मार्ग था जिसके माध्यम से अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म-प्रचार के लिए यहां आते रहे हैं. इस यात्रा के प्रमाण सिरपुर, रायगढ़ के चीनी शैलचित्रों आदि में आज भी मिलते हैं.

छत्तीसगढ़ गौरव गाथा में भी किया है इसका उल्लेख

भगवान बुद्ध की छत्तीसगढ़ यात्रा का विस्तृत वर्णन राज्य के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक स्वर्गीय हरि ठाकुर ने अपने महाग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ गौरव गाथा’ में किया है. पद्मश्री अरुण कुमार शर्मा के अनुसार सिरपुर में सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बौद्ध स्तूप का निर्माण करवाया था. छत्तीसगढ़ की इस पुरातात्विक नगरी में बुद्ध प्रतिमाओं के साथ अनेक प्राचीन बौद्ध स्मारक भी प्राप्त हुए हैं.

पहली बार हुएन सांग ने बताया गौतम बुद्ध श्रीपुर आए थे

प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन सांग 20 जून 639 ईस्वी को छत्तीसगढ़ की राजधानी श्रीपुर आये. वे श्रीपुर में एक माह रहे. उस समय छत्तीसगढ़ पर सम्राट बालार्जुन का राज्य था. श्रीपुर उनकी राजधानी थी. हुएन सांग ने अपने भारत भ्रमण का वृत्तांत एक पुस्तक में लिखा है. हुएन सांग के इस वृत्तांत से तीन बातों पर मुख्य रूप से प्रकाश पड़ता है. (1) भगवान गौतम बुद्ध श्रीपुर आए थे. उस समय श्रीपुर दक्षिण कोसल की राजधानी थी. दक्षिण कोसल को उस समय सिर्फ कोसल कहा जाता था.
(2) सम्राट अशोक ने श्रीपुर के दक्षिण में एक स्तूप का निर्माण करवाया था.
(3) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक तथा शून्य -दर्शन के प्रवर्तक महान दार्शनिक बोधिसत्व नागार्जुन श्रीपुर के निवासी थे. वे श्रीपुर के एक संघाराम में रहकर बौद्ध -धर्म -दर्शन का प्रचार करते थे. उन्हें सातवाहन राजा का संरक्षण प्राप्त था,जो उनका बहुत सम्मान करता था.

उत्तर-दक्षिण कोसल राजाओं में युध्द : भगवान बुद्ध ने की थी मध्यस्थता

अवदान शतक की एक कथा में भगवान गौतम बुद्ध के दक्षिण कोसल की यात्रा का उल्लेख है. तब उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल के राजाओं में युद्ध छिड़ गया. उत्तर कोसल के राजा का नाम प्रसेनजित था. दक्षिण कोसल के राजा का नाम विजयस था. युद्ध काफी लम्बा चला. युद्ध से त्रस्त होकर उत्तर कोसल का राजा प्रसेनजित उदास मुद्रा लेकर भगवान बुद्ध के पास जेतवन गया. प्रसेनजित ने उनसे प्रार्थना की कि वे मध्यस्थता करके शांति समझौता करा दें. भगवान बुद्ध ने उसे वाराणसी में आकर मिलने को कहा. दक्षिण कोसल नरेश विजयस को भी वाराणसी आने की सूचना भेज दी गयी. दोनों राजा वाराणसी पहुंचे. भगवान बुद्ध ने प्रसेनजित को उपदेश दिया, समझाया.

भगवान बुद्ध 3 माह तक रहे दक्षिण कौशल में

दक्षिण कोसल के राजा विजयस ने भगवान गौतम बुद्ध को अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया. उन्होंने निमंत्रण स्वीकार किया. वे दक्षिण कोसल आए और यहां की राजधानी में तीन माह तक रहे. दक्षिण कोसल नरेश ने उन्हें 1000 वस्त्र खण्ड भेंट किये. राजा की प्रार्थना पर भगवान बुद्ध ने उसे परम ज्ञान का उपदेश दिया.

नालंदा जैसा था सिरपुर का विद्या केन्द्र

ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि छत्तीसगढ़ में बौद्ध मत का प्रचार अशोक से भी बहुत पहले हो चुका था. बोधिसत्व नागार्जुन के समय तक श्रीपुर (सिरपुर) बौद्ध धर्म का एक प्रख्यात केन्द्र बन चुका था. हुएन सांग जब श्रीपुर आया, तब वहां महायानियों के सौ संघाराम थे और दस हजार भिक्षु विद्या अध्ययन कर रहे थे. इतने बड़े विद्या केन्द्र की तुलना नालंदा से की जा सकती है.

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