Budget 2026 UPI Policy: बजट 1 फरवरी को पेश होगा. इस बजट में देश की सरकार और वित्त मंत्री के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. यह सवाल UPI पेमेंट सिस्टम की खामियों को लेकर है. इन्हें दूर करना इस बजट की सबसे बड़ी चुनौती हो सकता है.
रिकॉर्ड ट्रांजेक्शन के बावजूद पेमेंट एग्रीगेटर्स को हो रहा नुकसान अब चिंता का विषय बन गया है. सवाल यह है कि क्या इस बजट में सरकार डिजिटल इंडिया की रफ्तार को बनाए रख पाएगी. क्या सरकार के पास ऐसा कोई प्लान है, जिससे डिजिटल क्रांति भी जारी रहे और किसी को नुकसान भी न हो.
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वास्तव में 10 रुपये की चाय से लेकर 50,000 रुपये के स्मार्टफोन तक, बिजली बिल या किराए के भुगतान तक, प्लास्टिक कार्ड और कागजी करेंसी धीरे-धीरे चलन से बाहर हो रही है. गूगल पे, फोनपे और अन्य UPI आधारित प्लेटफॉर्म रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं. नोटबंदी और कोरोना महामारी के बाद देश तेजी से कॉन्टैक्टलेस ट्रांजेक्शन की ओर बढ़ा है.
लेकिन इस सफलता के पीछे एक बढ़ती चिंता भी छिपी है, जिसे अब नीति निर्माता नजरअंदाज नहीं कर सकते.
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तेजी से विकास के बावजूद UPI के ट्रेडर नेटवर्क में थकान के संकेत दिखने लगे हैं. विश्लेषकों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में एक्टिव मर्चेंट QR नेटवर्क की ग्रोथ सिर्फ करीब 5 प्रतिशत CAGR रही है. आज भी देश के लगभग 45 प्रतिशत व्यापारी ही हर महीने UPI पेमेंट स्वीकार करते हैं.
भौगोलिक स्थिति और भी चौंकाने वाली है. देश के करीब एक तिहाई पिनकोड में 100 से कम एक्टिव UPI ट्रेडर्स हैं और लगभग 70 प्रतिशत पिनकोड में यह संख्या 500 से कम है, जबकि औसतन हर पिनकोड में 2,500 से ज्यादा व्यापारी होते हैं. यह अंतर सिस्टम पर बढ़ते दबाव को साफ दिखाता है.
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छिपी लागत का समाधान क्या
पेमेंट कंपनियों, बैंकों और फिनटेक फर्मों ने चेतावनी दी है कि UPI ग्रोथ का मौजूदा मॉडल अस्थिर होता जा रहा है. केंद्र सरकार द्वारा UPI और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन पर शून्य MDR लागू करने से वित्तीय समावेशन बढ़ा है, लेकिन इसका आर्थिक बोझ अब असहनीय होता जा रहा है.
RBI के अनुसार, हर एक ट्रांजेक्शन को प्रोसेस करने में करीब 2 रुपये का खर्च आता है. यह लागत पूरी तरह बैंकों और फिनटेक कंपनियों को उठानी पड़ती है. MDR वह शुल्क होता है, जो व्यापारी पेमेंट प्रोसेसिंग कंपनियों को देते हैं.
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लगातार घटता इंसेंटिव
PhonePe ने माना है कि मौजूदा शून्य MDR मॉडल आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है. कंपनी का कहना है कि इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए या तो MDR लागू करना होगा या फिर पर्याप्त सरकारी सब्सिडी देनी होगी.
वित्त वर्ष 2023-24 में 3,900 करोड़ रुपये का इंसेंटिव दिया गया था, लेकिन 2024-25 में यह घटकर 1,500 करोड़ रुपये रह गया. कंपनी के अनुसार यह राशि टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकथाम और यूजर एजुकेशन के लिए काफी नहीं है.
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RBI गवर्नर के संकेत
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि UPI हमेशा के लिए मुफ्त नहीं रह सकता. इसके कुछ खर्चे होते हैं और किसी न किसी को यह खर्च उठाना ही होगा. सिस्टम की स्थिरता के लिए यह जरूरी है कि कोई भुगतान करने वाला हो.
लॉन्ग टर्म रेवेन्यू मॉडल की कमी
भारतीय भुगतान परिषद (PCI) ने भी कहा है कि मौजूदा ढांचे में लॉन्ग टर्म रेवेन्यू मॉडल नहीं है. इससे भुगतान सिस्टम बनाने और संभालने वाली कंपनियों के लिए भविष्य में संकट खड़ा हो सकता है.
PhonePe के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सरकार ने डिजिटल पेमेंट इंसेंटिव के लिए सिर्फ 427 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जबकि अगले दो वर्षों में इकोसिस्टम को 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी.
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बजट 2026 बनेगा निर्णायक
फिनटेक कंपनियों का मानना है कि कंट्रोल्ड MDR फ्रेमवर्क लागू करने से इकोसिस्टम आत्मनिर्भर बन सकता है. इससे सरकार का बोझ कम होगा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा.
उद्योग जगत की मांग है कि बड़े व्यापारियों पर सीमित MDR लागू करने की अनुमति दी जाए, ताकि सिस्टम को स्थिर रखा जा सके. अगर सुधार नहीं हुआ, तो फिनटेक कंपनियों को विस्तार रोकना पड़ सकता है, जिससे डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन दोनों को नुकसान होगा. डिजिटल पेमेंट की मौजूदा MDR नीति पेमेंट कंपनियों और बैंकों पर लगातार दबाव बढ़ा रही है.
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