कैश कांड में फंसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपना त्‍यागपत्र राष्‍ट्रपति को भेज दिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उनके आधिकार‍िक आवास पर बड़ी मात्रा में जले हुए नोट पाए गए थे. जस्टिस वर्मा ने इसे अपना मानने से इनकार कर दिया था. इसको लेकर जस्टिस वर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की गईं, लेकिन उन्‍हें राहत नहीं मिली. 

जस्टिस यशवंत वर्मा ने ‘कैश-एट-होम’ मामले में महाभियोग की कार्यवाही से बचने के लिए राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। लेकिन अब वे आपराधिक जांच के दायरे में आ सकते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। अगर इस्तीफा मंजूर हुआ तो कथित ‘कैश-ऐट-होम’ विवाद को लेकर संसद में चल रही महाभियोग की प्रक्रिया भी खत्म हो जाएगी। राष्ट्रपति को भेजे पत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा, ‘मैं आपके इस गरिमामय कार्यालय पर उन कारणों का बोझ डालना उचित नहीं समझता, जिन्होंने मुझे यह पत्र लिखने के लिए विवश किया है। गहरे दुख के साथ मैं इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश के पद से तत्काल इस्तीफा देता हूं।’ 

संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाई कोर्ट का न्यायाधीश राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस्तीफा दे सकता है। औपचारिक स्वीकृति की जरूरत नहीं होती। चूंकि अब वे संवैधानिक पद पर नहीं है, इसलिए सरकार चाहे तो उन पर आपराधिक कार्यवाही शुरू कर सकती है।

 कैश कांड सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (CJI) ने तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति गठित की थी, जिसने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा की भूमिका पर सवाल उठाए थे.

इस्तीफा न देने पर मामला राष्ट्रपति प्रधानमंत्री तक गया और महाभियोग प्रक्रिया शुरू हुई। 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने  जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए बहुदलीय प्रस्ताव को स्वीकार किया और तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत किसी न्यायाधीश को ‘सिद्ध दुराचार’ या ‘असमर्थता’ के आधार पर पद से हटाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को चुनौती दी थी.

अब माना जा रहा है कि इस्तीफा देने से महाभियोग की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. हालांकि, जांच और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर अंतिम निर्णय संबंधित प्राधिकरणों द्वारा लिया जाएगा.

SC के एडवोकेट ज्ञानत सिह के मुताबिक, इस्तीफा स्वीकार होने पर महाभियोग की प्रक्रिया खत्म होगी। इस्तीफा हाई कोर्ट जजेज (सैलिरी एड कंडीशन सर्विस एक्ट) 1954 के तहत माना जाएगा। लिहाजा स्वीकार होने पर उनको रिटायरमेंट बेनिफिट मिल सकता है। 

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