CEC Appointment: देश में नया मुख्य चुनाव आयुक्त कौन होगा? 17 फरवरी को होने वाली बैठक से पहले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़(Jagdeep Dhankhad) ने शुक्रवार को भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी में एक कार्यक्रम में कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सीबीआई निदेशक चुनाव में कैसे भाग ले सकते हैं? मानदंडों पर “पुनर्विचार” करने का समय आ गया है. उन्होंने कहा कि ऐसी प्रक्रिया लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है.
देश लौटे PM मोदी, अब खत्म होगा दिल्ली CM पर सस्पेंस…15 नाम शॉर्टलिस्ट, PM मोदी लेंगे फाइनल फैसला!
वैसे, मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन में अब चीफ जस्टिस नहीं होते हैं. पहले वह तीन सदस्यीय पैनल में शामिल होते थे, जिसमें देश के प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस शामिल होते थे, लेकिन 2023 में कानून बनने के बाद उन्हें इस पैनल से बाहर कर दिया गया.
क्या बोले उपराष्ट्रपति?
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि भारत जैसे लोकतंत्र में देश के चीफ जस्टिस को किसी भी एग्जीक्यूटिव चुनाव में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने CBI डायरेक्टर की नियुक्ति का मुद्दा उठाते हुए कहा कि भारत जैसे लोकतंत्र में चीफ जस्टिस CBI डायरेक्टर के चुनाव में कैसे भाग ले सकते हैं? क्या इसके लिए कोई कानूनी तर्क है?
धनखड़ ने कहा कि ‘इस तरह का सिस्टम इसलिए बना था क्योंकि पहले की कार्यपालिका ने न्यायिक फैसले के आगे घुटने टेक दिए थे, लेकिन अब इन पर पुनर्विचार का दौर है. यह निश्चित रूप से लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता. हम भारत के मुख्य न्यायाधीश को किसी भी एग्जीक्यूटीव अपॉइंटमेंट में कैसे शामिल कर सकते हैं?
18 फरवरी को वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार रिटायर हो जाएंगे, इससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल के तीन सदस्यीय पैनल की बैठक होगी, जो अगले मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम पर चर्चा करेगा. बता दें कि इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर भी सुनवाई होनी है. याचिकाकर्ता का दावा है कि चीफ जस्टिस को तीन सदस्यीय पैनल में इस तरह की नियुक्ति में शामिल किया जाना चाहिए.
न्यायपालिका से हस्तक्षेप संवैधानिकता के विपरीत
धनखड़ ने कहा कि जवाबदेही लागू होती है जब निर्वाचित सरकारें कार्यकारी भूमिकाएं निभाती हैं. सरकारें विधायिका के प्रति और कभी-कभी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होती हैं, लेकिन अगर कार्यकारी शासन अहंकारी या बाहर से प्रेरित होता है, तो जवाबदेही नहीं होगी. विशेष रूप से, शासन सरकार के पास है. देश में या बाहर, विधायिका या न्यायपालिका से किसी भी स्रोत से कोई भी हस्तक्षेप संवैधानिकता के विपरीत है और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.
धनखड़ ने कहा, “जब मैं 1990 में संसदीय कार्य मंत्री बना था. आठ न्यायाधीश थे. अक्सर ऐसा होता था कि सभी आठ न्यायाधीश एक साथ बैठते थे. जब सुप्रीम कोर्ट में आठ न्यायाधीशों की संख्या थी, अनुच्छेद 145(3) के तहत यह प्रावधान था कि संविधान की व्याख्या पांच न्यायाधीशों या उससे अधिक की पीठ द्वारा की जाएगी.
उन्होंने दावा किया कि संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 145(3) के तहत मन में जो विचार रखा था, उसका सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि संविधान देश की सर्वोच्च अदालत को संविधान की व्याख्या करने की अनुमति देता है. अगर मैं अंकगणितीय रूप से विश्लेषण करूं, तो उस समय संख्या आठ थी, अब पांच और चार गुना से भी अधिक है, इसलिए उन्हें पूरा विश्वास था कि व्याख्या न्यायाधीशों के बहुमत से होगी.
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें English में पढ़ने यहां क्लिक करें
- खेल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
- मनोरंजन की बड़ी खबरें पढ़ने के लिए करें क्लिक