आकाश श्रीवास्तव, नीमच। Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर देश भर के सभी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। इसी में से एक मध्य प्रदेश के नीमच जिले में स्थित आरोग्य तीर्थ भादवा माता का दरबार है। मालवा की वैष्णो देवी के रूप में विख्यात इस मंदिर की महिमा इतनी अपार है कि यहां केवल भक्त ही नहीं, बल्कि कई रोगों से त्रस्त रोगी भी एक नई उम्मीद लेकर आते हैं।
प्राचीन बावड़ी के जल से खत्म होती हैं गंभीर बीमारियां
ऐसी मान्यता हे कि मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन बावड़ी के जल से स्नान और जल पीने मात्र से लकवा और मिर्गी जैसी गंभीर बीमारियां जड़ से खत्म हो जाती हैं। भक्त यहां के जल को अमृत मानकर बोतलों में भरकर घर ले जाते हैं और रोगग्रस्त अंगों पर लेप करते हैं।
500 वर्षों का गौरवशाली इतिहास और भील समुदाय की विरासत
भादवा माता मंदिर का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही दिलचस्प भी। लगभग 500 साल पुराने इस मंदिर के अस्तित्व को लेकर प्रमुख मान्यताएं हैं, जिनमें से एक राजस्थान के मेणार के ब्राह्मणों और दूसरी भील समुदाय के पूर्वजों से जुड़ी है। कहा जाता है कि मेवाड़ के महाराणा मोकल ने माता के चमत्कारों से प्रभावित होकर संवत् 1482 में भील समाज को यहां पूजा का विशेष अधिकार दिया था, जिसका निर्वहन आज भी भील समुदाय के पुजारी पूरी निष्ठा से कर रहे हैं।
नौ देवियों की भव्य प्रतिमाएं देख मंत्रमुग्ध हो जाते हैं श्रद्धालु
मंदिर के गर्भगृह में विराजित मां भादवा के साथ नौ देवियों की भव्य प्रतिमाएं भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। आज यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि मास्टर प्लान के साथ एक आधुनिक कॉरिडोर के रूप में भी विकसित हो रहा है। नवरात्रि के दौरान यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जबकि अष्टमी के दिन यह संख्या कई गुना हो जाती है, जिसकी सुरक्षा और सुविधा के लिए प्रशासन ने चाक-चौबंद व्यवस्था करती है।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाएं जाते हे जिंदा मुर्गे और बकरे, नहीं दी जाती कभी बलि
भादवा माता के दरबार में मन्नत पूरी होने पर चढ़ावे की परंपरा बेहद निराली और भावुक कर देने वाली है। यहां श्रद्धालु अपनी मुरादें पूरी होने पर माता को सोने-चांदी के छत्र, मुकुट, हार और सोलह श्रृंगार तो अर्पित करते ही हैं, लेकिन सबसे अनूठी परंपरा जीवित मुर्गे और बकरे चढ़ाने की रही है। गौर करने वाली बात यह है कि यहां बलि का कोई रिवाज नहीं है, भक्त इन बेजुबान जीवों को माता के चरणों में छोड़ देते हैं, जो बाद में मंदिर परिसर में ही स्वतंत्र रूप से घूमते रहते हैं।
ठीक हुए अंगों की ‘चांदी की प्रतिकृति’ चढ़ाते हैं भक्त
हालांकि, अब प्रशासन की नई व्यवस्था के तहत जीवित प्राणियों की जगह चांदी के प्रतीक स्वरूप बकरे और मुर्गे अर्पित करने की सलाह दी जाती है। बच्चों की लंबी उम्र के लिए जहां मुंडन संस्कार की प्रधानता है, वहीं असाध्य रोगों से मुक्ति मिलने पर भक्त अपने ठीक हुए अंगों की ‘चांदी की प्रतिकृति’ चढ़ाकर मां के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं।
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