रोहित कश्यप, मुंगेली. नगर पंचायत जरहागांव और ग्राम पंचायत छतौना के बीच प्रस्तावित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर जारी विवाद अब चर्चा का बड़ा विषय बन चुका है. इस घटनाक्रम में सियासत होना एक पक्ष है, लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर अस्पताल कहां बने, जिससे अधिकतम लोगों को सुविधा मिले और भविष्य की जरूरतें भी पूरी हो सकें.  

दरअसल, जिला पंचायत की सामान्य सभा में ग्राम छतौना की गौठान भूमि पर अस्पताल निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ. इसके आधार पर स्वास्थ्य विभाग ने कलेक्टर को भूमि आवंटन की अनुशंसा भेजी, वहीं राजस्व विभाग स्तर पर भी जांच प्रक्रिया शुरू की गई. प्रस्ताव सार्वजनिक होने के बाद नगर पंचायत जरहागांव के लोगों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई. उनका कहना है कि वर्तमान में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भवन में ही सीएसची संचालित है, इसलिए नविन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का भवन भी जरहागांव बनाया जाना अधिक व्यावहारिक होगा.   

छतौना का पक्ष – उपलब्धता और पहुंच  

छतौना के ग्रामीण इस प्रस्ताव को अपने क्षेत्र के विकास के रूप में देख रहे हैं. उनका कहना है, पहले से थाना, सेवा सहकारी समिति कार्यालय और धान खरीदी केंद्र इसी क्षेत्र में संचालित हैं. दोनों क्षेत्रों के बीच भौगोलिक मात्र एक पुल क्रॉसिंग है. प्रस्तावित भूमि मुख्य मार्ग से जुड़ी हुई है, जिससे मरीजों, एंबुलेंस और स्टाफ को सुविधा मिलेगी. ग्रामीणों का मानना है कि इस दृष्टि से यह स्थान दीर्घकालिक रूप से उपयोगी हो सकता है.  

जरहागांव का पक्ष – वर्तमान व्यवस्था और सुविधा    

दूसरी ओर, जरहागांव के नागरिकों का तर्क है कि अस्पताल वर्तमान में नगर क्षेत्र में संचालित है. नगर में पहले से बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं. लोगों की पहुंच और आदतों को देखते हुए यथास्थान निर्माण अधिक उपयुक्त रहेगा. उनका मानना है कि इससे सेवा की निरंतरता बनी रहेगी.

कांग्रेस ने उठाई स्थल चयन पर पुनर्विचार की मांग 

इस पूरे मामले में राजनीतिक गतिविधियां भी देखने को मिली हैं. हाल ही में कांग्रेस नेताओं ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर अपनी आपत्ति और मांग दर्ज कराई है. ज्ञापन के माध्यम से स्थल चयन पर पुनर्विचार की मांग उठाई गई, जिससे इस मुद्दे को और अधिक सार्वजनिक व राजनीतिक आयाम मिला. हालांकि, बीजेपी से जुड़े जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर खुलकर कम ही बोल रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर अपनी-अपनी राय जरूर रख रहे हैं.

कमीशनखोरी की चर्चा…

विवाद के बीच सबसे ज्यादा जिस पहलू ने लोगों का ध्यान खींचा है, वह निर्माण कार्य से जुड़ी संभावित कमीशनखोरी की चर्चा है.स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले इस अस्पताल निर्माण में “हिस्सेदारी” को लेकर अंदरखाने खींचतान चल रही हो सकती है. चर्चाओं में यह भी सामने आ रहा है कि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही “किसे क्या मिलेगा” जैसी बातें की जा रही हैं. स्थल चयन को लेकर अचानक बढ़ी सक्रियता को कुछ लोग इसी नजरिए से जोड़कर देख रहे हैं. दोनों पक्षों के समर्थकों द्वारा एक-दूसरे पर इस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं. हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जनचर्चा के रूप में ही देखा जाए, जब तक कि कोई ठोस प्रमाण सामने न आए.

महत्वपूर्ण प्रश्न…जो संतुलन तय करेंगे

इस पूरे विवाद में कुछ ऐसे अहम बिंदु हैं, जिन पर वस्तुनिष्ठ और तथ्य आधारित निर्णय लिया जाना जरूरी है. मसलन, किस स्थान से अधिक गांवों की पहुंच आसान होगी, आपातकालीन स्थिति में किस जगह से त्वरित प्रतिक्रिया संभव है, भविष्य में विस्तार के लिए पर्याप्त जमीन कहां उपलब्ध है और दोनों संभावित स्थलों पर बुनियादी ढांचे की मौजूदा स्थिति क्या है. यदि इन सवालों के स्पष्ट और संतुलित जवाब सामने आते हैं, तो निर्णय की दिशा तय करना कहीं अधिक सहज हो जाएगा.

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की सहमति से अंतिम निर्णय : DPM

डीपीएम गिरीश कुर्रे ने इस मामले पर कहा कि स्वास्थ्य विभाग का उद्देश्य केवल बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना है. भूमि चयन में पहुंच, सुविधा और व्यवहारिकता को प्राथमिकता दी गई है. अंतिम निर्णय स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की सहमति से लिया जाएगा. 

हालांकि, यह भी सच है कि प्रस्ताव को लगभग एक वर्ष होने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है. इससे स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं. इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अस्पताल केवल एक स्थान विशेष के लिए नहीं, बल्कि आसपास के लगभग 20 गांवों के लोगों के लिए प्रस्तावित है. इसलिए निर्णय किसी एक क्षेत्र की प्राथमिकता के बजाय व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर होना चाहिए.