अमित पांडेय, खैरागढ़। गरीबों और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना में करोड़ों की वित्तीय अनियमितता और लापरवाही का मामला सामने आया है। इस मामले में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने तत्कालीन कवर्धा नगर पालिका के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) नरेश वर्मा को निलंबित कर दिया है। वर्तमान में बेमेतरा नगर पालिका में पदस्थ वर्मा को निलंबन अवधि के दौरान दुर्ग स्थित संयुक्त संचालक (जेडी) कार्यालय से संबद्ध किया गया है।

भाजपा नेता की शिकायत से हुई जांच की शुरुआत

इस पूरे मामले को सार्वजनिक मंच पर लाने में खैरागढ़ जिले के पूर्व जिला भाजपा महामंत्री रामाधार रजक की अहम भूमिका रही। उन्होंने योजना में हो रही गड़बड़ियों की शिकायत शासन और विभागीय अधिकारियों से की थी, जिसके बाद जांच प्रक्रिया शुरू हुई और अंततः विभाग को यह कार्रवाई करनी पड़ी।

सूडा की जांच में खुली पोल

राज्य शहरी विकास अभिकरण यानी सूडा ने जून 2025 में इस पूरे मामले की जांच की। जांच में सामने आया कि मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना के तहत दवा खरीद, वितरण और भुगतान की प्रक्रिया में न तो पारदर्शिता बरती गई और न ही नियमों का पालन किया गया। इस लापरवाही और मनमानी के चलते शासन को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
प्रारंभिक जांच के बाद नरेश वर्मा को 20 लाख 80 हजार 380 रुपये की वित्तीय हानि का जिम्मेदार मानते हुए वसूली का नोटिस जारी किया गया। इसके बाद नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने मामले की गहराई से पड़ताल के लिए एक विशेषज्ञ जांच समिति गठित की और दस्तावेजों की विस्तृत जांच कराई।

एजेंसी पर नहीं लगाई पेनाल्टी, शासन को 25 लाख से ज्यादा का नुकसान

जांच समिति ने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंपी। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मोबाइल मेडिकल यूनिट यानी एमएमयू का संचालन करने वाली एजेंसी पर नियमानुसार अर्थदंड लागू ही नहीं किया गया। जबकि जिला अर्बन पब्लिक सर्विस सोसायटी के स्पष्ट निर्देश थे कि संबंधित एजेंसी पर पेनाल्टी लगाना अनिवार्य है। इस चूक की वजह से शासन को लगभग 25 लाख 91 हजार 500 रुपये की अतिरिक्त हानि हुई।

इतना ही नहीं, जांच में यह भी पाया गया कि एमएमयू संचालन एजेंसी को निर्धारित दर से अधिक भुगतान किया गया। सूडा द्वारा पूर्व में जारी पत्र में दवा खरीद और वितरण में अनियमितता के कारण 2 लाख 13 हजार 497 रुपये के अपव्यय और एजेंसी पर लगाए जाने वाले अर्थदंड सहित कुल 23 लाख 8 हजार 380 रुपये की वित्तीय गड़बड़ी दर्ज की गई थी। हैरान करने वाली बात यह रही कि इस पूरी राशि में से केवल 2 लाख 28 हजार रुपये की ही वसूली की गई और शेष राशि पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

गंभीर कदाचार की श्रेणी में रखा मामला, एफआईआर की भी अनुशंसा

जांच समिति ने इस पूरे प्रकरण को गंभीर वित्तीय अनियमितता और कदाचार की श्रेणी में रखा। समिति ने अपनी रिपोर्ट में नरेश वर्मा के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई, अतिरिक्त भुगतान की वसूली के साथ-साथ एफआईआर दर्ज कराने की भी अनुशंसा की थी। विभाग ने इस मामले को सेवा शर्तों का उल्लंघन, कर्तव्य में लापरवाही और वित्तीय अनुशासनहीनता मानते हुए फिलहाल निलंबन की कार्रवाई की है और स्पष्ट किया है कि शासन को हुई संपूर्ण वित्तीय हानि की वसूली संबंधित अधिकारी से की जाएगी।

अब सवाल — क्या सिर्फ निलंबन से होगा न्याय?

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। जब जांच समिति खुद एफआईआर की अनुशंसा कर चुकी है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या विभाग आगे आपराधिक कार्रवाई करेगा या यह मामला केवल निलंबन और वसूली की खानापूर्ति तक ही सिमट कर रह जाएगा? जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों से चलने वाली जनहितकारी योजनाओं में इस तरह की लूट प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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