शहीद दिवस विशेष : छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लूटते जल-जंगल-ज़मीन को बचाने फिर कोई ‘नारायण’ चाहिए, बस्तर से लेकर सरगुजा तक संघर्ष !

वैभव बेमेतरिहा, रायपुर। छत्तीसगढ़ भारत का एक ऐसा राज्य जिसे प्रकृति ने भरपूर खनिज संसाधन दिया है. यहाँ की हरित धरा में कोयला, लोहा, टिन, पानी का भंडार है. इसके साथ-साथ हीरा, सोना, बाइक्साइट, यूरेनियम भी अपार है. जल-जंगल-ज़मीन वाले इस स्वर्ग जैसे राज्य में दुनिया भर की आँखें हमेशा से गड़ी रही है. गोंड आदिवासियों की इस धरा को लूटने का काम आज़ादी से पहले भी हुआ और आज़ाद भारत में भी लूट जारी है.

अमीर धरती के गरीब आदिवासियों का शोषण आज भी जारी है. उनके क्षेत्रों में आक्रमणकारियों की फौज है. वे आज अपने ही घर में शांति से नहीं जी पा रहे हैं. बस्तर से लेकर सरगुजा तक संघर्ष की स्थिति है. आज जल-जंगल-ज़मीन पर बढ़ते लूट के साथ आदिवासियों के अस्तिव पर ही खतरा मंडराने लगा है. बस्तर में आदिवासी कॉरपोरेट लूट के साथ माओवादियों और पुलिस के बीच पीस रहे हैं. सरकार भी अधिकतर मोर्चों पर आदिवासियों के साथ खड़ी नज़र नहीं आती है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण सरगुजा में हसदेव अरण्य को बचाने बीते दो महीने से लगातार चल रहा आंदोलन है. सरगुजा, कोरबा, सूरजपुर जिला के बीच हसदेव अरण्य को खत्म करने की साजिश के खिलाफ आदिवासियों ने विद्रोह शुरू कर रखा है. आदिवासी इन इलाकों में किसी भी कीमत पर कोयला खदान नहीं चाहते, लेकिन आदिवासियों की सुनवाई नहीं हो रही है. सरकार ने अभी तक आंदोलनकारियों से कोई बात नहीं की है.

सरगुजा से वापस आप बस्तर आइये जहाँ पर आज़ाद भारत में सबसे बड़ा लौह अयस्क कारखाना खुला. छत्तीसगढ़ और बस्तरवासियों के साथ देखिए धोखा भी कैसे हुआ ? कारखाना तो दंतेवाड़ा में खुला लेकिन कार्यालय हैदराबाद में. हैदराबाद से एनएमडीसी का संचालन हो रहा है. इसका ख़ामियाजा ये हुआ कि बस्तरवासी इसका समूचित लाभ लेने से वंचित ही रहें. लेकिन इस कारखाने के खुलने के दशकों बाद भी बस्तर की दशा नहीं बदली, हाँ बस्तर की दिशा जरूर बदली. बस्तर में औद्योगिक विकास के बीच आदिवासियों पर शोषण और जुल्म ही बड़ा है.

स्व. ब्रम्हदेव शर्मा ने सन् 1971 में बस्तर कलेक्टर रहते हुए लिखा था कि “दंतेवाड़ा तहसील के औद्योगिक गतिविधियों के परिणामों का सर्वेक्षण करने पर यह बात प्रकाश में आई है कि अनेक बालिकाओं को अवांछनीय तत्वों द्वारा अपने पास कुछ समय तक रखने के पश्चात उन्हें अपना बिना सही नाम तथा पता तक बताये परित्याग कर दिया गया है. इन महिलाओं में से कुछ के उन व्यक्तियों से बच्चे भी है. परिणाम स्वरूप ये बालिकायें अपनी जाति से अलग करी दी गई हैं. इस स्थिति से वातावरण इतना दूषित हो गया है कि इसके फलस्वरूप अवांछनीय घटनाओं के होने की तथा अंत में शांति एवं व्यवस्था भंग होने की संभावना है.” ( ‘गागरी बेटी माटा माझी की’ स्व. ब्रम्हदेव शर्मा, तत्कालीन बस्तर कलेक्टर, सन् 1971).

बतौर बस्तर कलेक्टर जो कुछ ब्रम्हदेव शर्मा ने देखा था वहीं आगे चलकर हुआ भी. बस्तर में शांति भंग हुई. और इसी शोषण और अत्याचार के बीच माओवादी पैठ बनाते गए. नतीजा बस्तर में आज अशांति की स्थिति है. विकास के क्रम में इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि आज बस्तर में सीमा पर तैनात जवानों से कहीं अधिक जवानों की सुरक्षा घेरे में आदिवासियों का रहना पड़ रहा है. उन आदिवासियों को जो अपने जल-जगल-ज़मीन में खुले तौर पर जीना चाहते हैं. जहाँ उनके साथ न पुलिस की चुनौतियाँ हो और न वन विभाग की बंदिशें.

छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के 19 वर्ष बाद भी चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई. कुछ हद तक हालात बदले तो सही, लेकिन वास्तव में जंगलों में अब भी राज मूलनिवासियों का नहीं हो पाया है. आज भी वनवासियों को वनों से बेदखल करने की कोशिशें जारी है. कहीं खदान के नाम पर, कहीं बांध के नाम पर, कहीं अभ्यारण्य के नाम पर, कहीं टाईगर रिजर्व के नाम पर उन्हें विस्थापित करने काम किया जा रहा है. हालांकि नई सरकार में बस्तर में एक ताकतवर औद्योगिक समूह को रोकने, आदिवासियों को ज़मीन लौटाने काम भी हुआ है. वहीं एनएमडीसी पर असर पड़ा है. नतीजा एक कार्यालय बस्तर में एनडीसी का खुलने वाला है इसके संकेत भी मिले हैं. लेकिन यह आदिवासियों के हक में पर्याप्त नहीं है.

याद करिए सन् 1824-25 का परलकोट विद्रोह. जब अबूझमाड़ में आक्रमण करते हुए अँग्रेजों ने घुसपैठ कर दी थी. तब ज़मींदार गैंद सिंह ने अँग्रेजी सेना से लोहा लिया था. वास्तव में अँग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ पहला क्रांतिकारी विद्रोह यही था. इसमें गैंद सिंह शहीद हो गए थे. इतिहासकारों ने अबूझमाड़ को याद नहीं रखा. रखते तो भारत में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद गैंद सिंह ही कहलाते.

याद करिए सन् 1857 का सोनाखान विद्रोह. एक ऐसा विद्रोह जिसने अँग्रेजी सत्ता की नींव छत्तीसगढ़ में हिला दी थी. यह एक तरह से पहला ऐसा विद्रोह अँग्रेजों के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ में था, जिसमें सेना बनाकर वीरनारायण सिंह लड़े थे. इतिहासकार डॉ रमेंद्र मिश्र बताते हैं कि अंग्रेजों के नए कर और अकाल के चलते सोनाखान का पूरा इलाका भूखमरी का शिकार हो गया. जनता त्राहि-त्राहि करने लगी. तब नारायण सिंह ने कसडोल के व्यापारी माखन सिंह से अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया. लेकिन व्यापारी माखन नहीं माना और नारायण सिंह ने अनाज लूटकर लोगों में बंटवा दिया. जमाखोरों ने इसकी शिकायत ब्रिटिश शासन से की ब्रिटिश शासन ने वीरनारायण सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर 24 अक्टूबर 1856 को संबलपुर से गिरफ्तार कर लिया और उसे रायपुर जेल में बंद कर दिया. लेकिन अंग्रेज अधिक दिन तक वीरनारायण को कैद कर नहीं रख सके और वे अंग्रेजों की कैद से फरार हो गए. इस दौरान अंग्रेज शासनकाल के खिलाफ आजादी के आंदोलन शुरू हो चुके थे. जेल में बंद नारायण सिंह को अपना नेता मान लिया. अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह बढ़ने लगा. अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध आदिवासी एकजुट होने लगे. देशभक्त जेलकर्मियों के जरिए नारायण सिंह को उनके साथियों ने छुड़ा लिया. 1857 में जेल से मुक्त होने के बाद नारायण सिंह ने 500 सैनिकों का सैन्य दल बनाया. सैन्य दल बनाते ही वीरनायारण ने अंग्रेजी हुकूमत पर हमला बोल दिया. इलियट ने स्मिथ नाकम सेनापति को नारायण सिंह को गिरफ्तार करने भेजा. नारायण सिंह गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों पर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेज सैनिक भाग खड़े हुए. लेकिन कुछ बेइमान जमीदारों की मदद से अंग्रेजों ने वीरनारायण को फिर से गिरफ्तार कर लिया. और फिर 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेजों ने रायपुर के वर्तमान जय स्तंभ चौक पर फांसी दे दी थी.

जिस सोनाखान इलाके में वीरनारायण सिंह अँग्रेजों से लड़े थे उसी सोनाखान को बेचने की कोशिश भी, उस इलाके को एक औद्योगिक घराने को लीज पर दे दिया गया. हालांकि भारी विरोध के बाद नई सरकार ने इस पर रोक लगा दी. लेकिन खतरा अभी तक पूरी तरह से टला नहीं है.

नदी घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बंधोपाध्याय बताते हैं कि अंधाधुन औद्योगिक विकास में हमने जंगलों से बहने वाली नदियों का खूब नुकसान किया है. फिर चाहे वह बस्तर में बहने वाली शंखिनी-डंकनी हो या फिर इंद्रावती और शबरी नदी. बीते वर्ष तो विशाल इंद्रावती ही सूख गई थी. शंखिनी और डंकनी का पानी तो अब किसी भी रूप में उपयोग करने लायक नहीं है. यही हाल सरगुजा, कोरबा में हसदेव का है, रायगढ़ में केलो का, रायपुर में खारुन और दुर्ग में शिवनाथ का है. इन नदियों के अस्तिव पर भी खतरा मंडरा रहा है. महानदी पर भी औद्योगिक घरानों का कब्जा हो चुका है. कहने का मतलब ये हैं कि इन नदियों का पानी औद्योगिक घरानों को बेचा जा रहा है, किसानों का इसका बहुत कम लाभ मिल रहा है. छत्तीसगढ़ में विकास पैमाना स्थानीय निवासियों के अनुरूप ही हो, उससे अलग नहीं. छत्तीसगढ़ में कई बार सूखा पड़ चुका है. शहीद वीरनारायण सिंह ने भी तो अकाल पड़ने के वक़्त जमाखोरों से अनाज लूट जनता में बांटने का काम किया था. आज सरकार चावल तो बांट रही, लेकिन बदले में किसानों से, वनवासियों से जमीन ले रही है. विकास का ये तरीका नहीं हो सकता है. इससे संघर्ष की स्थिति बनती ही है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला बताते हैं कि करीब 350 वर्ग किलोमीटर तक संघन वन खत्म हो चुका है. लाखों हेक्टयेर जंगल उद्योग के नाम पर ले लिए गए. सर्वाधिक प्रभावित इसमें बस्तर, कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा का क्षेत्र रहा है. इन इलाकों में आदिवासियों से ज़मीन छिनने का सिलसिला आज भी जारी है. सच तो ये है कि आदिवासियों की सुनवाई हो नहीं रही है. वनवासी अभाव में जी सकते हैं, लेकिन औद्योगिक घरानों के प्रभाव में वे जीने लायक नहीं बच रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में जब जल-जंगल-ज़मीन पर अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वास्तव में बस्तर से लेकर सरगुजा तक आदिवासियों को सरकार से अगर कुछ चाहिए तो वो सबसे पहले उस जल-जंगल-ज़मीन पर अधिकार है, जिसमें वे आदि काल से काबिज है. आदिवासी अपने वनों में बिना रोक-टोक रहना चाहते हैं, वो अपने इलाके में किसी बाहरी का दखल नहीं चाहते हैं. फिर चाहे वह सरकार का ही हस्तक्षेप क्यों न हो ? आदिवासी बस यही चाहते हैं कि पाँचवीं अनुसूची के तहत उन्हें जो अधिकार संविधान से मिला है उसका पालन हो. हालांकि ऐसा हो नहीं रहा. नतीजा बस्तर से लेकर सरगुजा तक समय-समय पर आदिवासी अपने अधिकारों को लेकर रैलियाँ निकालते हैं, धरना देते हैं, राजधानी तक में आकार सरकार के समक्ष अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं. लेकिन सत्ता और पूँजीपतियों की ताकत इतनी होती कि आदिवासी को मुआवजा या अन्य तरह की व्यवस्थाओं के साथ अंत में जंगल से बेदखल कर ही दिए जाते हैं.

इस बीच हमे कुछ वर्ष पूर्व उत्तर बस्तर कांकेर और रायगढ़, जशपुर क्षेत्र में हुए पत्थलगढ़ी आंदोलन को भी याद करना होगा. यह आंदोलन किस पृष्ठभूमि, किन कारणों से हुआ यह दृष्टिगत् है. आदिवासी जितने सहज-सरल, निर्मल, निश्च्छल होतें हैं, उतने ही विद्रोही स्वभाव के भी होते हैं. वे अपने अधिकारों की रक्षा कैसे करना यह बखूबी जानते हैं. परिणामतः जब पानी सर से ऊपर उठता है फिर वहाँ संघर्ष की स्थिति बनती है. इस संघर्ष को आज भी छत्तीसगढ़ में देखा जा रहा है.

खनिज संसाधनों पर आज सरकारी उपक्रमों से कहीं ज्यादा निजी घरानों का जो राज हो रहा उससे अंसतोष उपजा है और असमानता की स्थिति बनी है. आदिवासी इन सब मौके के बीच गैंद सिंह, गुंडाधूर, वीरनारायण, महाराजा प्रवीणचंद को जरूर याद करते हैं. उन्हें यह मसहूस होता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए, उनके जल-जंगल-ज़मीन को बचाने फिर कोई नारायण सिंह चाहिए.

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