अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ में लंबे समय से उठते रहे धर्मांतरण से जुड़े सवाल अब एक संगठित और सुनियोजित नेटवर्क की ओर इशारा करने लगे हैं। राजनांदगांव जिले के लालबाग थाना अंतर्गत सुकुलदेहन पुलिस चौकी में दर्ज प्रकरण ने न केवल जिला प्रशासन बल्कि खुफिया एजेंसियों की भी चिंता बढ़ा दी है। ग्राम धर्मापुर से शुरू हुई यह शिकायत अब राज्यव्यापी चर्च नेटवर्क, संदिग्ध विदेशी फंडिंग और व्यवस्थित प्रशिक्षण तंत्र तक पहुंचती दिखाई दे रही है।

छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत दर्ज इस मामले में आरोपी डेविड चाको की भूमिका जांच के केंद्र में है। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि कथित रूप से आश्रम और चर्च की आड़ में नाबालिग बच्चों को रखा जा रहा था तथा उन्हें विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल के माध्यम से प्रभावित करने की गतिविधियां संचालित की जा रही थीं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह महज एक स्थानीय या व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित ढांचे का हिस्सा हो सकता है, जिसकी जड़ें राज्य से बाहर और संभवतः देश के बाहर तक जुड़ी हैं।

प्रशिक्षण सामग्री और पुस्तकों ने बढ़ाई जांच की गंभीरता
विवेचना के दौरान जब्त की गई पुस्तकों, दस्तावेजों और प्रशिक्षण सामग्री ने पुलिस को चौंका दिया है। इनमें प्रयुक्त शब्दावली, प्रतीकात्मक भाषा और वैकल्पिक अर्थों को लेकर जांच एजेंसियों का संदेह गहराया है। आशंका जताई जा रही है कि इन प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से मानसिक प्रभाव डालने और धीरे-धीरे वैचारिक बदलाव की रणनीति अपनाई जा रही थी। इन सभी सामग्रियों का तकनीकी और विषयगत विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा किया जा रहा है।
वित्तीय लेन-देन बना सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है। जांच में ट्रैवल वाउचर्स, एकॉमोडेशन प्लान और “ऑफिस बेयर्स” को किए गए भुगतान से जुड़े दस्तावेज सामने आए हैं। इससे संकेत मिलते हैं कि कथित गतिविधियां केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं थीं, बल्कि एक संगठित ऑपरेशन के रूप में संचालित की जा रही थीं।

ग्रासरूट स्तर पर सक्रिय लोगों को “पॉल” जैसे पदनाम देकर भुगतान, ऑनलाइन और नगद क्लेम की व्यवस्था, तथा फंड के स्रोतों को छिपाने की कोशिश—इन सभी बिंदुओं ने जांच को और व्यापक बना दिया है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि धन कहां से आया, किस माध्यम से भारत लाया गया और किन-किन खातों के जरिए इसका उपयोग किया गया।

चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी जांच के दायरे में
दिसंबर माह में छत्तीसगढ़ में आयोजित चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी जांच एजेंसियों के रडार पर है। इस कार्यक्रम में राज्यभर से समान स्तर के लोगों की भागीदारी, कुछ सत्रों के विषयों की संदिग्ध प्रकृति और चयनित लोगों को ही प्रशिक्षण दिए जाने की प्रक्रिया ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियां यह जानने का प्रयास कर रही हैं कि इन कार्यक्रमों का वास्तविक उद्देश्य क्या था और इसके पीछे कौन-कौन लोग सक्रिय थे।
पहले से सामने आते रहे हैं ऐसे मामले
छत्तीसगढ़ के जशपुर, नारायणपुर, कांकेर, बस्तर और दुर्ग संभाग जैसे जिलों से पहले भी धर्मांतरण से जुड़ी शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में यह पैटर्न उभरकर आया है कि पहले सामाजिक सेवा, शिक्षा या चिकित्सा सहायता के नाम पर संपर्क स्थापित किया जाता है, फिर प्रशिक्षण और वैचारिक प्रभाव के जरिए धीरे-धीरे धार्मिक पहचान बदलने की कोशिश होती है। राजनांदगांव का यह मामला उसी बड़े पैटर्न से जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है।
जांच का दायरा अब और विस्तृत
पुलिस ने साफ कर दिया है कि जांच अब केवल आरोपी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी। चर्च के कथित हेडक्वार्टर, संचालन प्रक्रिया, निर्णय लेने वाली इकाइयों, जोनल कमांडर और जोनल लीडर स्तर के पदाधिकारियों तक जांच का दायरा बढ़ाया गया है। अमेरिका से भारत लाई गई धनराशि, डॉलर से नगद में रूपांतरण और खातों के बीच हुए ट्रांजैक्शन भी गहन जांच के दायरे में हैं।
कानून की सबसे बड़ी परीक्षा
राज्य में लागू छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम का उद्देश्य जबरन, प्रलोभन या छल से होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है। राजनांदगांव का यह मामला अब इस कानून की सबसे बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है। यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो कार्रवाई केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे नेटवर्क पर गहरी चोट मानी जाएगी।
फिलहाल पुलिस और जांच एजेंसियों की विवेचना जारी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मामला छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़े अब तक सामने आए मामलों में सबसे संगठित, संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाला प्रकरण बन चुका है। आने वाले दिनों में इसके नतीजे राज्य की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाल सकते हैं।
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