नितिन नामदेव, रायपुर। छत्तीसगढ़ में छात्रसंघ चुनाव को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच राज्य सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उच्च शिक्षा मंत्री टंक राम वर्मा ने साफ शब्दों में कहा है कि फिलहाल छात्रसंघ चुनाव कराने को लेकर सरकार के स्तर पर कोई विचार नहीं किया गया है और न ही इसकी कोई संभावना है।

लल्लूराम डॉट कॉम से बातचीत के दौरान मंत्री ने संकेत दिए कि सरकार इस मुद्दे पर तत्काल कोई निर्णय लेने के पक्ष में नहीं है। उनके इस बयान से साफ हो गया है कि फिलहाल छात्रों की मांग पर सरकार नरमी दिखाने के मूड में नहीं है।

दूसरी ओर, छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर NSUI लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पिछले कई दिनों से संगठन के कार्यकर्ता प्रदेशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल ही में NSUI ने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और आयुष विश्वविद्यालय का घेराव कर अपनी मांग को जोरदार तरीके से उठाया था।

प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतरे और नारेबाजी की। कुछ स्थानों पर पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच झूमाझटकी की स्थिति भी बनी, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। NSUI नेताओं का कहना है कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों की आवाज को संस्थागत रूप देने का माध्यम है और इसे लंबे समय से बंद रखना छात्रहितों के खिलाफ है। संगठन का आरोप है कि सरकार जानबूझकर इस मुद्दे को टाल रही है।

इधर, NSUI ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सात दिनों के भीतर उनकी मांग पर ठोस जवाब नहीं दिया गया, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। संगठन ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में प्रदेशव्यापी प्रदर्शन, विश्वविद्यालय बंद और बड़े स्तर पर आंदोलन की रणनीति अपनाई जा सकती है।

2016 तक प्रत्यक्ष प्रणाली से हुए छात्रसंघ चुनाव

राज्य में वर्ष 2014 से 2016 तक छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली, यानी मतदान के जरिए आयोजित किए गए। इसके बाद से छात्रसंघ पदाधिकारियों का चयन मनोनयन के आधार पर किया जा रहा है, जिसे लेकर लंबे समय से प्रत्यक्ष चुनाव बहाल करने की मांग उठती रही है।

दरअसल, वर्ष 2014 में छात्रसंघ गठन के लिए प्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान लागू किया गया था, जिसकी अवधि तीन वर्ष निर्धारित की गई थी। इस अवधि में 2014, 2015 और 2016 में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और महासचिव का चयन मतदान के माध्यम से हुआ।

हालांकि, नियम की अवधि समाप्त होने के बाद 2017 में यह निर्णय कुलपतियों पर छोड़ दिया गया कि वे चुनाव मतदान से कराएं या मनोनयन के आधार पर छात्रसंघ का गठन करें। इसके बाद कुलपतियों की अनुशंसा के आधार पर मेरिटोरियस छात्रों को पद देने की व्यवस्था लागू कर दी गई।

फिलहाल, एक ओर सरकार का सख्त रुख है, वहीं दूसरी ओर NSUI का बढ़ता दबाव। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने के आसार हैं।

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