राजभाषा दिवस विशेष : छत्तीसगढ़ी को शिक्षा का माध्यम बनाने में आठवीं अनुसूची अनिवार्य नहीं, राज्य सरकार चाहे तो मिनट में हो सकता है फैसला !

छत्तीसगढ़ी कैलेण्डर का हुआ विमोचन, जागेश्वर प्रसाद को महतारी अस्मिता सम्मान

वैभव बेमेतरिहा, रायपुर। 28 नवंबर को छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के मौके पर दो महत्वपूर्ण सत्रों में छत्तीसगढ़ी पर विस्तार से चर्चा हुई. छत्तीसगढ़ी को कैसे शिक्षा और सरकारी काम-काज की भाषा बनाएँ इस पर विमर्श हुआ. इन दो सत्रों में साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों की विशेष मौजूदगी रही. परिचर्चा में यह बात स्पष्ट रूप से निकलकर सामने आई कि मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए आठवीं अनुसूची की अनिवार्यता नहीं है. तकनीकी सत्र में नंदकिशोर शुक्ल ने इसे दस्तावेजी प्रमाण के साथ बताया है.

मैं आपके अभियान के साथ- अनुसुईया उइके
मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी समिति की ओर से जे. एन. पाण्डेय सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों ने यही संकल्प लिया कि छत्तीसगढ़ी को शिक्षा का माध्यम और सरकारी काम-काज की भाषा बनाने सामूहिक प्रयास करेंगे. यहाँ तक राज्यपाल अनुसुईया उइके ने भी कहा कि वे बतौर संरक्षक छत्तीसगढ़ी अभियान के साथ हैं. छत्तीसगढ़ी को पूरी तरह से केंद्रीय मान्यता दिलाने वह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष अपनी बात रखेंगी. छत्तीसगढ़ी में जो मिठास है वह दिल को छू लेने वाली है.


मैं स्कूलों में छत्तीसगढ़ी को विस्तारित करूँगा- जी. आर. चंद्रकार
जिला शिक्षा अधिकारी ने आयोजन की तारीफ करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई लिखाई के अभियान को आगे बढ़ाने की दिशा में मैं पूरी कोशिश करूँगा. सच कहूँ तो इस आयोजन से मुझे और प्रेरित कर दिया है. मैं अपने जिले के तमाम स्कूलों में छत्तीसगढ़ी के पक्ष में वातावरण बनाने का काम करूँगा. बच्चें मातृभाषा में जल्दी सीखते हैं. मातृभाषा ही शिक्षा की भाषा होनी चाहिए. वहीं जे.एन.पाण्डेय स्कूल के प्राचार्य एम.आ.सावंत ने कहा कि उन्हें खुशी है कि उनके स्कूल में मातृभाषा पर एक बड़ा आयोजन हुआ. इस आयोजन हम सबको प्रेरित किया है. वास्तव में हम सबकी जिम्मेदारी राज्य की राजभाषा को पढ़ाई-लिखाई का माध्यम बनाएँ.


सरकार चाहे तो मिनट में हो सकती है मातृभाषा में शिक्षा की शुरुआत- नंदकिशोर शुक्ल
पढ़ाई-लिखाई और सरकारी काम-काज की भाषा छत्तीसगढ़ी
विषय पर छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के संयोजक नंदकिशोर शुक्ल ने कहा कि राज्य निर्माण के 19 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई-लिखाई नहीं होना बेहद दुःख की बात है. हमने राज्य निर्माण के बाद 7 साल तक लगातार संघर्ष किया था, जिसके बाद सरकार ने 2007 में विधेयक लाकर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया था. लेकिन उसके बाद इस दिशा में सरकार ने ऐसी कोई पहल नहीं की कि वह शिक्षा का माध्यम बन सके. छत्तीसगढ़ी को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने में किसी भी तरह से कोई कानूनी अड़चन नहीं है. न ही आठवीं अनुसूची में शामिल होना जरूरी है. विश्वविद्याल में छत्तीसगढ़ी में एम.ए. की पढ़ाई हो रही है, लेकिन स्कूल में नहीं. सरकार में इच्छा शक्ति की कमी है. नहीं तो मिनट नहीं लगेंगे पढ़ाई शुरू  होने में. छत्तीसगढ़ी का अपना समृद्ध व्याकरण है. समृद्ध साहित्य है. पाठ्यक्रम भी तैयार है फिर भी इसे टाला क्यों जा रहा यह समझ से परे हैं ?

मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी संस्था की ओर से मिले सुझाव पर करेंगे अमल- जे. आर. भगत
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सचिव जे. आर. भगत ने कहा कि यह सच है कि छत्तीसगढ़ी को जल्द से जल्द सरकारी काम-काज की भाषा बनानी है है. हम इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं. हम भी यही चाहते हैं हर स्तर पर अधिकारी-कर्मचारी छत्तीसगढ़ी राजभाषा में ही काम-काज करें. लेकिन यह कहा जा सकता है कि पहले की अपेक्षा अब और तेज गति इस दिशा में प्रयास होगा. मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी के इस आयोजन में साहित्याकरों और विषय-विशेज्ञयों की ओर से जो सुझाव आए हैं उस पर आवश्यक रूप से काम किया जाएगा.

आपकी मांग को मुख्यमंत्री के समक्ष रखूँगा- प्रदीप शर्मा
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सलाहकार प्रदीप शर्मा ने कहा कि यह अत्यंत गौरव की बात है कि देश-दुनिया में हमारी मातृभाषा का कोई जवाब नहीं है. सबसे मीठी और गुरतुर भाषा छत्तीसगढ़ी है. मैं यह कह सकता हूँ कि नई सरकार के गठन के बाद भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने में तेजी से काम हुआ है. शपथग्रहण समारोह में छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रभाव दिखा था. इसके बाद तो सरकार के हर काम-काज में छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति का रंग दिख रहा है. फिर भी मैं आप सबकी ओर से मुख्यमंत्री के समक्ष कार्यक्रम में जिन बातों पर विमर्श हुआ उसे अवश्य रूप से रखूँगा.

मांग पूरी नहीं हुई तो आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे- अमित बघेल
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश अध्यक्ष अमित बघेल ने कहा कि अभी तक परदेसिया राज भले ही चलता रहा होगा, लेकिन अब छत्तीसगढ़ियों का ही राज चलेगा. भाषा और संस्कृति से अब किसी भी तरह से समझौता नहीं किया जाएगा. मातृभाषा में ही पढ़ाई-लिखाई करानी होगी. सरकारी काम-काज की भाषा भी यहाँ की मातृभाषा ही होगी. अगर सरकार ने निवेदन के साथ मांग पूरी नहीं की तो फिर हम आंदोलन की राह में भी होंगे.

उत्तर बस्तर में गोंडी में दी जा रही शिक्षा- विष्णुदेव
कांकेर में गोंडी भाषा में बच्चों को शिक्षा देने वाले विष्णुदेव भी बतौर अतिथि शामिल हुए हैं. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ गोंडी में पढ़ाई-लिखाई होनी चाहिए. मैं गोंडी की शिक्षा को लेकर देश के कई विश्वविद्यालयों में गया. मुझे जानकारी मिली गोंडी विश्व की प्राचीन भाषा है. ऐसे में हमारा दायित्व कि हम अपनी प्राचीन भाषा को बचाएं. उन्होंने इस मौके पर गोंडी में एक गीत की प्रस्तुति भी दी.

चुप नहीं बैठे रहेंगे- जागेश्वर प्रसाद
अलग छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के आंदोलनकारी नेता जागेश्वर प्रसाद ने कहा कि छत्तीसगढ़ी की आवाज को बुलंद करने का काम हम सबने किया है. इसका सुखद परिणाम भी दिख रहा है. फिर भी जब तक मातृभाषा में पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत नहीं हो जाती हमें चुप नहीं बैठना है.

बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ी में एक रूपता- बिहारी लाल साहू
साहित्य, संस्कृति, सिनेमा और अन्य जनमाध्यम में छत्तीसगढ़ी
विषय के दूसरे सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार बिहारी लाल साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ी को लेकर राज्य में कहीं कोई भेद नहीं है. छत्तीसगढ़ी को लेकर पूरे प्रदेश में एक रूपता है. ऐसे में छत्तीसगढ़ी को लेकर सवाल उठाने वाले लोग मातृभाषा के विरोधी लोग हैं. बस्तर लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है. छत्तीसगढ़ी भाषा राज्य की राजभाषा है. करोड़ों छत्तीसढ़ियों की मातृभाषा है. छत्तीसगढ़ी के साथ हल्बी, गोंडी, सरगुजिया, कुड़ुक भाषा में पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत तत्काल की जानी चाहिए.

छत्तीसगढ़ी का समृद्ध साहित्य- परदेशी राम वर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार परदेशीराम वर्मा कहा कि छत्तीसगढ़ का साहित्य भंडार समृद्ध है. यहाँ पर भारत नहीं बल्कि दुनिया में छा जाने वाले साहित्यकारों ने जन्म लिया है. छत्तीसगढ़ी साहित्य में वह श्रेष्ठता है कि उसे अध्यन-अध्यापन का माध्यम बनाया जा सकता है. सरकार चाहे तो यहाँ के साहित्यकारों की मदद लेकर जल्द से जल्द छत्तीसगढ़ी को शिक्षा का माध्यम बनाने की दिशा में काम कर सकती है.

छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा बहुत हुई अब नहीं होने देंगे- लता राठौर
छत्तीसगढ़िया महिला क्रांति सेना की प्रदेश अध्यक्ष लता राठौर ने कहा कि हम बीते 7 सालों से लगातार इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक हमने अपनी आवाज बुलंद की है. छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा बहुत हो गई अब नहीं होने देंगे. हमारी सिर्फ और सिर्फ यही मांग है बुनियादी शिक्षा प्रदेश के बच्चों को मातृभाषा में मिलनी चाहिए. छत्तीसगढ़ियों के साथ भाषा और संस्कृति को लेकर छल नहीं चलेगा.

मैं आज जो कुछ भी हूँ छत्तीसगढ़ी भाषा की बदौलत हूँ-  पद्मश्री अनुज शर्मा
सिनेमा पर अपनी बात रखते हुए पद्मश्री अनुज शर्मा ने कहा कि आज वे जो कुछ भी अपनी मातृभाषा की बदौलत है. उनकी पहचान की जड़ ही मातृभाषा है. बतौर फिल्म अभिनेता उनकी सारी उपलब्धियाँ छत्तीसगढ़ी भाषा पर टिकी है. मुझे सिनेमा के जरिए काम, नाम और पहचान सिर्फ और सिर्फ छत्तीसगढ़ी की बदौलत मिली है. और इसी के जरिए मुझे पद्म सम्मान मिल सका है. छत्तीसगढ़ी भाषा न हो तो छत्तीसगढ़ी सिनेमा रहेगा क्या ? जाहिर इस सवाल का जवाब है नहीं रह सकता है. ऐसे में बिना भाषा के न तो संस्कृति और न ही सिनेमा है. इसलिए छत्तीसगढ़ी सिनेमा को जीवित रखने के लिए जरूरी छत्तीसगढ़ी को शिक्षा का माध्यम बनाएँ, सरकारी काम-काज छत्तीसगढ़ी में कराएं. मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी ने इस दिशा में सबकों एकजुट करने काम किया है इसके लिए मैं सभी को धन्यावद भी देता हूँ और बधाई भी.

इंटरनेट में सबसे तेजी से छा जाने वाली भाषा बन रही है छत्तीसगढ़ी- संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ी को गूगल में पहुँचाकर उसे विश्व व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुरतुर गोठ वेब न्यूज़ पोर्टल के संपादक संजीव तिवारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी आज देश की तमाम भाषाओं में सबसे तेजी से विस्तारित होती भाषा बन चुकी है. गूगल पर 20 हजार के करीब छत्तीसगढ़ी शब्दों का भंडार हो चुका है. छत्तीसगढ़ी के अनेक पुस्तक ऑनलाइन हो चुके हैं. छत्तीसगढ़ी में कविता-कहानियों का भंडार आज गूगल पर मिल जाएंगे. इंटरनेट में आज छत्तीसगढ़ी लिखते ही ढेर सारी सामग्रियाँ उपलब्ध हो जाती है. इन तमाम स्थितियों को देखते हुए यही कह जा सकता है कि मातृभाषा का विस्तार छत्तीसगढ़ के साथ-साथ देश-दुनिया में अन्य जगहों पर जहाँ कहीं भी छत्तीसगढ़िया समाज है उन तक हो रहा है. मैं पूरी तरह से आश्वसत हूँ कि सरकार को यह निर्णय लेना ही होगा कि मातृभाषा को जल्द से जल्द शिक्षा का माध्यम बना दिया जाए.

शिक्षा का माध्यम बने बिना भाषा का विकास संभव नहीं- अरुण निगम
जनकवि स्वर्गीय कोदूराम दलित के पुत्र कवि अरुण निगम ने कहा कि छत्तीसगढ़ी तो अंतस की भाषा है. छत्तीसगढ़ी का इतिहास सैकड़ों साल पुरानी है. छत्तीसगढ़ी का भविष्य भी उज्ज्वल है. लेकिन फिर भी जो काम राज्य निर्माण के 19 साल बाद तक पूरा नहीं हुआ जरूरत सबसे पहले उसे पूरा करने का है. छत्तीसगढ़ी के साथ हल्बी, गोंडी, सरगुजिया, कुड़ुक को पढ़ाई-लिखाई में शामिल करना चाहिए. इसके बिना भाषा का विकास संभव नहीं है. छत्तीसगढ़ियों का भी विकास भाषा और संस्कृति के साथ ही संभव है.

इस विशेष अवसर पर 40 वर्षों तक छत्तीसगढ़ी सेवक पत्रिका निकालने वाले समाजसेवी, आंदोलनकारी नेता छत्तीसगढ़ महतारी के सेवक जागेश्वर प्रसाद को महतारी अस्मिता सम्मान से सम्मानित भी किया है. वहीं छत्तीसगढ़ी कैलेण्डर ‘बछर’ के नए अंक का विमोचन राज्यपाल ने किया.

कार्यक्रम में नवनीत, दिव्यांग छात्राओं की ओर से राजगीत अरपा पैरी के धार की मोहक प्रस्तुति दी गई. वहीं राज्यपाल के कहने पर आरू साहू और लक्ष्मी कलिहारे ने छत्तीसगढ़ी गीतों की प्रस्तुति दी. सभी अतिथियों और सभागार में मौजूद साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, गणमान्यक नगारिकों और छात्र-छात्राओं का आभार संजीव साहू ने जताया.

Related Articles

Back to top button
survey lalluram
Close
Close
धन्यवाद, लल्लूराम डॉट कॉम के साथ सोशल मीडिया में भी जुड़ें। फेसबुक पर लाइक करें, ट्विटर पर फॉलो करें एवं हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें।