दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई में कहा है कि पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न हिस्सा है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह आदेश देते हुए केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें रेहेजा डेवलपर्स के पूर्व निदेशक योगेश रेहेजा का पासपोर्ट जब्त किया गया था। यह जब्ती इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने पासपोर्ट नवीनीकरण के समय उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर की जानकारी नहीं दी थी।

पासपोर्ट जब्त करने का आदेश रद

कोर्ट ने केंद्र के 17 जनवरी, 2025 के पासपोर्ट जब्त करने के आदेश और अपील खारिज करने वाले 25 मार्च, 2025 के अपीलीय आदेश को रद कर दिया। कोर्ट ने कहा, ‘पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। ऐसे किसी भी राज्य कार्यवाही को उचित होना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।’

मामले की पृष्ठभूमि

योगेश रेहेजा ने अक्टूबर 2024 में पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। अधिकारियों ने दावा किया कि 2018 में दर्ज एक एफआईआर की जानकारी छिपाई गई थी। 17 जनवरी 2025 को पासपोर्ट जब्त कर लिया गया और अपील 25 मार्च 2025 को खारिज कर दी गई। याचिकाकर्ता के वकील ने 2019 के विदेश मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि केवल एफआईआर दर्ज होना ही आपराधिक कार्यवाही लंबित नहीं माना जाता, जब तक कि सक्षम अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान नहीं लिया जाता।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

कोर्ट ने देखा कि रेहेजा ने नवीनीकरण के लिए अक्टूबर 2024 में आवेदन किया था, लेकिन संज्ञान जब्ती के आदेश से एक महीने बाद फरवरी 2025 में लिया गया। अत: जब्ती के समय कोई आपराधिक कार्यवाही लंबित नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों द्वारा दिए गए कारण कानून की जांच में टिक नहीं पाते। कोर्ट में कहा कि राज्य की कोई भी कार्रवाई जो पासपोर्ट रखने के अधिकार पर प्रभाव डालती है, वह उचितता की जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुपालन में होनी चाहिए।

निष्कर्ष और राहत

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं। इसलिए, 17 जनवरी 2025 और 25 मार्च 2025 के आदेश रद किए जाते हैं। याचिकाकर्ता योगेश रेहेजा की ओर से सीनियर एडवोकेट संदीप कपूर (करणजावाला एंड कंपनी के सीनियर पार्टनर) ने पक्ष रखा। यह फैसला पासपोर्ट कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को मजबूत करता है।

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