लंबे समय तक ईयरफोन या हेडफोन का इस्तेमाल आपकी सुनने की क्षमता पर गंभीर असर डाल सकता है। All India Institute of Medical Sciences, New Delhi के ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पर्सनल लिसनिंग डिवाइस का अत्यधिक उपयोग “नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस” (Noise Induced Hearing Loss) का बड़ा कारण बन रहा है। आज 3 मार्च को वर्ल्ड हियरिंग डे मनाया जा रहा है। इस अवसर पर All India Institute of Medical Sciences, New Delhi के ईएनटी विभाग की डॉक्टर पूनम सागर ने सुनने की सेहत को लेकर अहम चेतावनी दी है।

डॉ. पूनम सागर ने कहा कि यदि लंबे समय तक तेज आवाज में गाने सुनने की आदत बनी रहती है तो कान के भीतर मौजूद संवेदनशील हेयर सेल्स (कोशिकाएं) स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। ये कोशिकाएं ध्वनि को पहचानकर उसे दिमाग तक पहुंचाने का काम करती हैं। एक बार इनका नुकसान हो जाए तो सुनने की क्षमता पूरी तरह वापस नहीं आती।

नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस का बढ़ता खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार ईयरफोन या हेडफोन के जरिए हाई वॉल्यूम में म्यूजिक सुनना “नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस” का प्रमुख कारण बन रहा है। यह समस्या अब युवाओं और किशोरों में तेजी से देखी जा रही है।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज (टिनिटस)

बातचीत के दौरान शब्द साफ न सुनाई देना

बार-बार लोगों से बात दोहराने के लिए कहना

डॉक्टरों का कहना है कि वर्ल्ड हियरिंग डे का उद्देश्य लोगों को सुनने की सेहत के प्रति जागरूक करना है। सही वॉल्यूम पर सीमित समय तक ही ईयरफोन का उपयोग करें और किसी भी तरह की दिक्कत महसूस होने पर तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से परामर्श लें।

डॉक्टरों ने युवाओं से की अपील

वर्ल्ड हियरिंग डे के मौके पर All India Institute of Medical Sciences, New Delhi के ईएनटी विशेषज्ञों ने युवाओं और किशोरों को तेज आवाज में ईयरफोन इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी है। डॉक्टरों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 120 डेसीबल की क्षमता पर सिर्फ 5 मिनट भी ईयरफोन सुनता है, तो यह कानों के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है। वहीं, 60 डेसीबल की अपेक्षाकृत कम आवाज पर 8 घंटे लगातार सुनना भी सुरक्षित नहीं है। दोनों ही स्थितियों में सुनने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है।

टीनएजर्स में बढ़ता चलन

विशेषज्ञों ने बताया कि टीनएजर्स में लंबे समय तक मोबाइल, गेमिंग और ऑनलाइन क्लास के दौरान ईयरफोन इस्तेमाल करने का चलन तेजी से बढ़ा है। कई युवा मेट्रो, बस या ट्रैफिक जैसे शोरगुल वाले माहौल में वॉल्यूम और ज्यादा बढ़ा देते हैं, जिससे कानों पर दोहरा दबाव पड़ता है। तेज बाहरी शोर और हाई वॉल्यूम का यह संयोजन “नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस” के खतरे को बढ़ा देता है। एक बार कान के अंदर की संवेदनशील कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाएं तो सुनने की क्षमता पूरी तरह वापस नहीं आती।

कम उम्र में बहरे हो रहे लोग

डॉ. पूनम ने कहा कि आमतौर पर 50 साल की उम्र के बाद लोगों की सुनने की क्षमता में कमी आती है, लेकिन अब 40 की उम्र के बाद ही हियरिंग लॉस के मामले सामने आने लगे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह पर्सनल लिसनिंग डिवाइस जैसे ईयरफोन और हेडफोन का बढ़ता इस्तेमाल है।

हर घंटे ब्रेक लेना जरूरी

उन्होंने बताया कि शोरगुल वाले माहौल में ईयरफोन का इस्तेमाल और भी नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि लोग बाहरी आवाज दबाने के लिए वॉल्यूम बढ़ा देते हैं। इससे कानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। डॉ. पूनम सागर के मुताबिक, इस समस्या से बचाव संभव है अगर कुछ सावधानियां अपनाई जाएं डिवाइस को उसकी अधिकतम वॉल्यूम के 60% से कम पर सुनें। लगातार लंबे समय तक इस्तेमाल न करें। करीब 60 मिनट सुनने के बाद जरूर ब्रेक लें, ताकि कानों को आराम मिल सके।

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