हर्षित तिवारी, खातेगांव। मां नर्मदा के संरक्षण, संवर्धन और पर्यावरण रक्षा की पीड़ा अगर किसी ने सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि अपने जीवन से जीकर दिखाई है, तो वे हैं दादा गुरु भैय्या जी सरकार। आज जब दुनिया पर्यावरण बचाने की बातें मंचों पर करती है, दादा गुरु ने प्रकृति के साथ एकाकार होकर उसे बचाने का संकल्प लिया है। 

दादा गुरु के बारे में सबसे अधिक चर्चित और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि वे मां नर्मदा का जल सेवन कर जीवित हैं। न कोई अन्न, न कोई आहार। यह बात जितनी आस्था से जुड़ी है, उतनी ही विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती भी बन चुकी है। सवाल उठता है कि क्या केवल जल पर कोई व्यक्ति न सिर्फ जीवित, बल्कि पूरी तरह सक्रिय रह सकता है? 17 सितंबर 2022 से दादा गुरु जिस कठोर तप में लीन हैं, इन दिनो दादा गुरु मां नर्मदा की पैदल  परिक्रमा यात्रा पर हैं , उनके साथ हजारों परिक्रमा वासी पैदल इस यात्रा में चल रहे हैं।

उन्होंने न केवल श्रद्धालुओं को, बल्कि वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को भी हैरान कर दिया है। बताया जाता है कि वे बीते पांच सालों से अन्न का पूरी तरह त्याग कर चुके हैं, फिर भी उनकी शारीरिक ऊर्जा, सक्रियता और सहनशक्ति में कोई कमी नहीं आई। हर दिन 30 से 35 किलोमीटर तक पैदल नर्मदा परिक्रमा करना, वह भी बिना रुके, बिना थके। यह सामान्य मानव शरीर के लिए लगभग असंभव माना जाता है।

इसी असाधारण तपस्या को लेकर कुछ वर्ष पूर्व राज्य सरकार के निर्देश पर जबलपुर की मेडिकल टीम ने दादा गुरु पर शोध करने की पहल की थी। इसका उद्देश्य इस तप को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना और प्रमाणित करना था। हालांकि शोध की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई, लेकिन इतना जरूर कहा गया कि दादा गुरु की जीवनशैली और शारीरिक सक्रियता मेडिकल साइंस के लिए अनेक प्रश्न खड़े करती है।

दादा गुरु केवल तपस्वी संत नहीं हैं, वे सनातन परंपरा के सारथी भी माने जाते हैं। उनका संदेश स्पष्ट है, प्रकृति से दूर होकर मानव का अस्तित्व संभव नहीं। मां नर्मदा उनके लिए सिर्फ नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति हैं। फिलहाल, दादा गुरु आस्था और विज्ञान के बीच एक जीवंत सेतु बन चुके हैं। वे प्रमाण हैं कि जब संकल्प अडिग हो और उद्देश्य लोक कल्याण का हो, तो असंभव भी संभव हो सकता है। मां नर्मदा के जल पर आश्रित यह जीवन, केवल चमत्कार नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के गहरे संबंध की कहानी है, एक ऐसी कहानी, जो श्रद्धा के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है।

उन्होंने बताया कि भारत मे शक्तियां प्रत्यक्ष हैं। दुनिया नदी को नदी के रूप में देख रही है, हमारे लिए वो शक्तियां हैं। शक्तियां मां नर्मदा के रुप मे गंगा के रूप हैं। यह हमारा बल नहीं सनातन का सामर्थ हैं, हम पेड़ पहाड़ो मे ईश्वर का दर्शन करते हैं। दादा गुरु आज आस्था और विज्ञान के बीच एक जीवंत सेतु बन चुके हैं। उनका संदेश स्पष्ट है, प्रकृति से दूर होकर मानव का अस्तित्व संभव नहीं। मां नर्मदा के जल पर आश्रित यह जीवन केवल चमत्कार नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के गहरे संबंध की प्रेरक कहानी है।

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