अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्यप्रदेश के मऊगंज में अजब-गजब मामला सामने आया है। जिस व्यक्ति पर आदिवासी छात्राओं से अभद्रता का आरोप लगा था उसे फिर से तीन तीन छात्रावास की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

रीवा कमिश्नर के आदेश पर जांच

मामला 16 सितंबर 2025 का है। मनोज पटेल प्रभारी मंडल संयोजक के खिलाफ सुकवरिया कोल, पूनम कोल और इंद्रा मिश्रा जैसी वार्डन ने मोर्चा खोला था। आरोप कि जातिसूचक गालियां, एक लाख रुपये की रिश्वत की मांग और सबसे घिनौना आरोप-कन्या छात्रावास में नियमों को ताक पर रखकर रात-बेरात घुसपैठ। रीवा कमिश्नर के आदेश पर जांच हुई। अनुविभागीय अधिकारी (SDM) की जांच रिपोर्ट में जो खुलासे हुए, वो सिस्टम के मुंह पर तमाचा हैं। छात्राओं ने बयान दिया कि मनोज पटेल सुबह /शाम 6 बजे हॉस्टल में घुस आता था।

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जांच में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सही पाया

मासूम बच्चियों ने कहा- जब हम नहाते थे, तब वो आ जाता था, हमें पानी की टंकी के पीछे छुपना पड़ता था। छात्राओं ने बताया कि वह उनके कंधों पर हाथ रखता था, उनके कपड़ों के वीडियो बनाता था और वार्डन को बाहर जाने को कहता था। जांच में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सही पाया गया। रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि मनोज पटेल का कृत्य घोर निंदनीय’ और उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए।

तो फिर ये संरक्षण क्यों?

6 फरवरी 2026 को जारी पत्र ने न्याय की उम्मीद पर कालिख पोत दी। उसे बहाल कर दिया गया। इतना ही नहीं, जिला संयोजक ने उसे फिर से तीन बालक छात्रावासों का अधीक्षक बना दिया। सवाल ये है कि क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है? क्या मासूम बच्चों का भविष्य उस व्यक्ति के हाथ में सुरक्षित है जिसे जांच में ही ‘अमर्यादित’ और ‘दोषी’ माना जा चुका है? दूरभाष पर चर्चा के दौरान जिला संयोजक कहते हैं कि ‘जांच चल रही है’। जब बच्चियों के बयान दर्ज हो चुके हैं, जब ऑडियो में पैसों की डील साफ है, तो फिर ये संरक्षण क्यों?

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