पटना। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को कानूनी मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने लैंड फॉर जॉब से संबंधित भ्रष्टाचार मामले में उनके द्वारा दायर की गई प्राथमिकी (FIR) रद्द करने की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद लालू यादव और उनके परिवार पर चल रहे केस की तलवार और गहरा गई है।

​मेरिट के अभाव में याचिका रद्द

​जस्टिस रविंद्र डुडेजा की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि लालू यादव की अर्जी मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर टिकने योग्य नहीं है। लालू यादव ने अपनी दलील में मुख्य रूप से यह कहा था कि सीबीआई ने मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक कानूनी मंजूरी हासिल नहीं की थी। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना और 2022, 2023 और 2024 में दाखिल तीनों चार्जशीट और उन पर लिए गए संज्ञान को रद्द करने से इनकार कर दिया।

​आपराधिक गिरोह जैसी सख्त टिप्पणी

​इस मामले में निचली अदालत के स्पेशल जज विशाल गोग्ने ने भी पूर्व में बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि लालू यादव और उनका परिवार एक अपराधिक गिरोह की तरह काम कर रहा था। अदालत के अनुसार, रेलवे में सरकारी नौकरियों को एक सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया ताकि परिवार के सदस्यों (पत्नी, बेटों और बेटियों) के नाम पर बेशकीमती अचल संपत्तियां हासिल की जा सकें।

​क्या है पूरा मामला?

​सीबीआई का आरोप है कि जब लालू यादव रेल मंत्री थे, तब रेलवे के विभिन्न जोनों में ग्रुप-डी के पदों पर नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों और उनके परिवारों से जमीनें कौड़ियों के भाव लिखवाई गई थीं। इस साजिश में उनके परिवार के कई सदस्य नामजद हैं, जिनके खिलाफ जांच एजेंसियां लगातार शिकंजा कस रही हैं।