दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने हाल ही में एक गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस (Delhi Police) के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ कहा कि बार-बार मौके देने के बावजूद पुलिस ने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जो बेहद गंभीर लापरवाही मानी जा रही है। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि जमानत जैसे महत्वपूर्ण मामलों में इस तरह की ढिलाई न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है। अदालत ने यह भी कहा कि इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वरिष्ठ अधिकारी जमीनी हालात से पूरी तरह अनजान हैं।  हाईकोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी कि ऐसी लापरवाही न्याय प्रणाली और लोगों के भरोसे को प्रभावित कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब से सभी विभागों से समय पर रिपोर्टिंग और जवाबदेही की अपेक्षा की जाएगी।

अग्रिम जमानत याचिका खारिज

मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर होने के कारण आरोपी को इस स्तर पर कोई राहत नहीं दी जा सकती। आरोपी को 21 मार्च शाम 5 बजे तक जांच अधिकारी के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की सभी कानूनी कार्रवाई और जांच प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी।

यह मामला साल 2024 में दर्ज हुआ था। आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका अक्टूबर 2024 से लंबित थी। इस लंबित स्थिति के कारण आरोपी को कई बार अंतरिम राहत मिलती रही।  अतिरिक्त लोक अभियोजक ने माना कि बार-बार याद दिलाने के बावजूद जांच अधिकारी और संबंधित थाने के एसएचओ ने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की। हाईकोर्ट ने इस ढिलाई को गंभीर लापरवाही करार दिया और कहा कि इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।

एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला ने कहा कि उसके देवर ने पति की जानकारी और समर्थन से उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। अदालत ने इन आरोपों को बेहद गंभीर माना और मामले को संवेदनशील बताया। हाईकोर्ट ने इस मामले की गहन और संवेदनशील जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।

समझौते की दलील खारिज

आरोपी पक्ष के वकील ने दावा किया कि यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच का पारिवारिक विवाद है और दोनों पक्षों में समझौता हो चुका है। शिकायतकर्ता के वकील ने इस दावे को पूरी तरह नकार दिया। अदालत ने कहा कि इतने गंभीर आरोपों वाले मामले को पारिवारिक विवाद कहकर हल्का नहीं दिखाया जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने आदेश की कॉपी दिल्ली पुलिस के डीसीपी लीगल सेल को भेजने के निर्देश दिए, ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही न हो। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में सख्ती और बढ़ाई जा सकती है, ताकि पीड़ित को न्याय समय पर मिले और कानूनी प्रक्रिया प्रभावित न हो।

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