राजधानी में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए संबंधित एजेंसियों को तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस (Delhi Police) और गृह मंत्रालय (Home Ministry) को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर संयुक्त बैठक करें। इस बैठक में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस निर्णय लिया जाए और उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए। यह मामला ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका के जरिए कोर्ट के समक्ष आया है, जिसमें जजों और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई है।
दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में की मांग
ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन की ओर से दाखिल याचिका में मांग की गई है कि जिला न्यायपालिका में कार्यरत जजों को व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) उपलब्ध कराए जाएं और उनके आवासों पर भी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज जैन ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में उठाई गई चिंताएं बेहद गंभीर हैं और इन्हें किसी भी तरह हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जजों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था करना आवश्यक है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे इस मुद्दे पर संयुक्त बैठक करें और अगली सुनवाई से पहले अदालत में विस्तृत रिपोर्ट पेश करें।
जजों को मिल रही धमकियों का हवाला
ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा है कि जज अपने न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अक्सर धमकियों, दुर्व्यवहार और अन्य सुरक्षा जोखिमों का सामना करते हैं। ऐसे हालात न केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गरिमा और लोगों के भरोसे को भी प्रभावित कर सकते हैं। याचिका में यह भी बताया गया कि दिल्ली के अधिकांश न्यायिक अधिकारी खुद ही अपनी गाड़ी चलाकर अदालत आते-जाते हैं। इस दौरान कई बार उन्हें रास्ते में रोकने, पीछा करने और रोड रेज जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है, जो उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।
इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट पहले ही दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय को निर्देश दे चुका है कि वे इस विषय पर संयुक्त बैठक कर ठोस समाधान निकालें और अगली सुनवाई से पहले विस्तृत रिपोर्ट पेश करें।
याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ मामलों में अदालत परिसर के भीतर ही गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है, और अतीत में अदालतों के भीतर हिंसा या गोलीबारी जैसी घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। इससे न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ जाती है। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने माना कि यह स्थिति बेहद संवेदनशील है और जजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
पहले भी भेजा गया था प्रतिनिधित्व
ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन ने अदालत को बताया कि इस मुद्दे पर उन्होंने पिछले साल 23 अप्रैल को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी एक प्रतिनिधित्व भेजा था, जिसमें जजों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए रजिस्ट्रार जनरल को भी मामले में पक्षकार बनाया है और निर्देश दिया है कि उस प्रतिनिधित्व पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, इसकी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश की जाए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी जज को विशेष खतरे की स्थिति में सुरक्षा देना पर्याप्त समाधान नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी न्यायिक अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से खतरे की आशंका होती है तो उन्हें सुरक्षा दी जा सकती है, लेकिन इससे व्यापक समस्या का समाधान नहीं होता। इसलिए जरूरत एक समग्र और ठोस नीति बनाने की है, जिससे सभी न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
अन्य राज्यों की व्यवस्था भी जांचेगी बैठक
न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने निर्देशों में एक और अहम बिंदु जोड़ा है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि प्रस्तावित बैठक के दौरान यह भी जानकारी जुटाई जाए कि देश के अन्य राज्यों में न्यायिक अधिकारियों को किस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था दी जाती है क्या उन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) उपलब्ध कराए जाते हैं या कोई अन्य सुरक्षा तंत्र लागू है। इस मामले में जस्टिस मनोज जैन की बेंच अब अगली सुनवाई 21 अप्रैल को करेगी, जहां संबंधित एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।
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