दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अलगाव के बाद पत्नी के बैंक खाते में कुछ बचत होना या परिवार को एक बार पैसे भेजना, पति के लिए भरण-पोषण देने से इनकार करने का वैध आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य पत्नी को सम्मानजनक जीवन स्तर उपलब्ध कराना है और इसे इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि उसके पास सीमित बचत है या उसने कभी अपने परिवार की मदद के लिए धन भेजा हो। हाई कोर्ट ने दोहराया कि पति की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह पत्नी का भरण-पोषण करे, जब तक यह साबित न हो जाए कि पत्नी स्वयं आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है।

कोर्ट ने क्या तर्क दिए?

दिल्ली हाई कोर्ट ने पति की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि बिना ठोस सबूत जैसे नियमित सैलरी, व्यवसाय या स्थायी आय के प्रमाण एक बार किया गया ट्रांसफर या सीमित बचत को स्थिर कमाई नहीं माना जा सकता।बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “कुछ बचत का होना या भाई को एक बार पैसे भेजना, यह नहीं दर्शाता कि पत्नी के पास खुद को और बच्ची को पति के बराबर स्तर पर रखने की स्थिर आय है। 2018 की एक अकेली ट्रांजेक्शन से पर्याप्त कमाई साबित नहीं होती और न ही इसके आधार पर भरण-पोषण रोका जा सकता है।”

अन्य मांगें भी ठुकराईं

पति ने यह भी मांग की कि भरण-पोषण की राशि जॉइंट अकाउंट में जमा कराई जाए, ताकि वह यह देख सकें कि पैसा बच्ची के कल्याण पर ही खर्च हो रहा है या नहीं। हालांकि हाई कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का मामला केवल देय राशि से जुड़ा होता है, न कि कस्टडी या विजिटेशन अधिकारों से। इस स्तर पर इस तरह की शर्तें लगाना उचित नहीं है। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि पति को हर महीने पत्नी और बेटी दोनों को 25-25 हजार रुपये भरण-पोषण के रूप में देना होगा।

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, 2001 में हुई शादी से दंपति की एक बेटी हुई। हालांकि 2015 से पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। इसके बाद पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। इस दौरान फैमिली कोर्ट ने मार्च 2021 में अंतरिम भरण-पोषण का आदेश पारित किया। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी और बेटी दोनों को 25-25 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण के तौर पर अदा करे।

पति ने फैमिली कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी मुख्य दलील यह थी कि पत्नी ने 2018 में अपने भाई को 82 हजार रुपये ट्रांसफर किए थे और उसके बैंक खाते में कुछ बचत भी मौजूद थी। पति का तर्क था कि इससे यह साबित होता है कि पत्नी के पास पर्याप्त आय और आर्थिक साधन हैं, इसलिए उसे भरण-पोषण देने की आवश्यकता नहीं है।

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