दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि कामुक इरादे से किसी छोटे बच्चे को अपने गुप्तांगों को छूने के लिए मजबूर करना बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत गंभीर यौन हमला माना जाएगा। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी करते हुए एक आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। आरोपी ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे लगभग चार साल की बच्ची के सामने अपने गुप्तांग प्रदर्शित करने और उसे छूने के लिए मजबूर करने का दोषी ठहराया गया था।
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की हरकतें बच्चे की शारीरिक और मानसिक गरिमा पर सीधा हमला हैं और इन्हें हल्के अपराध के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत दोषी ठहराए जाने और दी गई सजा को सही ठहराया।
POCSO के तहत गंभीर यौन हमला
कोर्ट ने बताया कि POCSO कानून के तहत 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे पर यौन हमला स्वतः ही ‘गंभीर यौन हमला’ माना जाता है। इस मामले में निचली अदालत ने आरोपी को जुलाई 2024 में दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत के अनुसार, आरोपी पीड़िता के घर में किरायेदार था और यह अपराध साल 2022 में हुआ था। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी की हरकतें बच्चे की मासूमियत, गरिमा और मानसिक सुरक्षा पर सीधा हमला हैं और ऐसे अपराधों में किसी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती।
मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने 5 जनवरी को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया, “कामुक इरादे से किसी छोटे बच्चे को गुप्तांग छूने के लिए मजबूर करना गंभीर यौन हमला है। इसलिए POCSO कानून अधिनियम की धारा 10 के तहत अपराध सिद्ध होता है।” अदालत ने आरोपी की अपील को खारिज करते हुए कहा, “अपील में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे लंबित आवेदनों (यदि कोई हों) के साथ खारिज किया जाता है।” कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती।
हाईकोर्ट ने खारिज किया आरोपी का दावा
दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी के इस दावे को खारिज कर दिया कि पीड़िता को सिखाया-पढ़ाया गया है और उसके खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न का मूल आरोप पीड़िता के बयानों में लगातार बना रहा और अभिव्यक्ति में मामूली बदलाव या अंतर उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करते। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में बयान देते समय शब्दों या विवरण में हल्का फर्क आना स्वाभाविक है और इसे आधार बनाकर पीड़िता की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में हुई देरी उसके खिलाफ मामला कमजोर करती है। अदालत ने कहा कि FIR में देरी का कारण पर्याप्त रूप से स्पष्ट किया गया है और इसे अभियोजन के रास्ते में अवरोधक नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता की मां का पुलिस से संपर्क करने से पहले अपने पति के दूसरे शहर से लौटने का इंतजार करना पूरी तरह स्वाभाविक था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में सामाजिक परिस्थितियों और पारिवारिक स्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए और केवल देरी के आधार पर मामले को संदेह के घेरे में नहीं डाला जा सकता।
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