दिल्ली हाईकोर्ट(Delhi High Court) ने शादी के बाद गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में स्पष्ट किया है कि अंतरिम भत्ता तय करते समय पत्नि को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि वह खुद कमाती है या अपने खर्चे खुद संभाल सकती है। कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि पति का केवल दावा करना कि पत्नी खुद खर्च उठा सकती है, बिना किसी प्रमाण के मान्य नहीं होगा। हाईकोर्ट के अनुसार, अंतरिम भत्ता का निर्णय करते समय अदालत को सभी परिस्थितियों और सबूतों का गंभीरता से विचार करना चाहिए।

बिना सबूत के दावा खारिज

यह टिप्पणी उस याचिका पर आई जिसमें महिला ने फैमिली कोर्ट के 2,500 रुपये मासिक अंतरिम भत्ते के फैसले को चुनौती दी थी। पति ने दावा किया था कि उनकी पत्नी नर्सरी टीचर हैं और कमाती हैं, लेकिन इसके लिए उन्होंने कोई दस्तावेज पेश नहीं किया। कोर्ट ने महिला की सिर्फ 11वीं तक की पढ़ाई का हवाला देते हुए कहा, “बिना प्रमाण के ऐसा खोखला दावा इस स्टेज पर किसी काम का नहीं। अंतरिम भत्ते के लिए पत्नी को कमाने वाली मानना ठीक नहीं।”

शादी के बाद क्रूरता और घर से निकाला

यह मामला उस महिला से जुड़ा है, जो जून 2021 में मुस्लिम रीति-रिवाज से शादीशुदा हुई थी। महिला का आरोप है कि दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल में क्रूरता का सामना करना पड़ा और 2022 में घर से बाहर निकाल दिया गया। उसने यह भी कहा कि उसका कोई व्यक्तिगत कमाई का स्रोत नहीं है।

पति की कमाई पर सवाल

इस मामले में पत्नी ने दावा किया कि उसका पति ग्रेजुएट और प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं, जिनकी सैलरी करीब 25,000 रुपये है। इसके अलावा वह प्राइवेट ट्यूशन से 15,000 रुपये, किराने की दुकान और किराए से 30,000 रुपये अतिरिक्त कमाते हैं। ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए 2,500 रुपये मासिक अंतरिम भत्ते को वह बहुत कम मानती हैं।

पति ने अपने बचाव में कहा कि वह एनजीओ में स्पेशल एजुकेटर हैं और केवल 10,000 रुपये कमाते हैं। लेकिन हाईकोर्ट ने नोट किया कि यह रकम ग्रेजुएट के लिए न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। साथ ही, पति ने पूरी बैंक स्टेटमेंट भी नहीं पेश की, केवल सीमित अवधि की स्टेटमेंट दी, जिसमें सैलरी का कोई स्पष्ट ट्रांजेक्शन नहीं दिखा।

भत्ता बढ़ाकर 3,500 रुपये किया

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी के पास कोई स्वतंत्र आय नहीं है, और दोनों पक्षों की स्थिति तथा पति की आंकी गई कमाई को देखते हुए पुराना भत्ता बहुत कम था। हाईकोर्ट ने पति की कमाई का आकलन करते हुए उत्तर प्रदेश में ग्रेजुएट/स्किल्ड वर्कर के लिए लागू न्यूनतम मजदूरी (तब लगभग 13,200 रुपये) को आधार बनाया। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि पति बकाया राशि तीन महीने के भीतर चुकाएं। इस फैसले से स्पष्ट संकेत मिलता है कि अदालत पत्नी की वित्तीय सुरक्षा और न्यूनतम जीवनयापन सुनिश्चित करने के पक्ष में है।

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