दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना (Vinay Kumar Saxena) को सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर(Megha Patkar) द्वारा दायर मानहानि मामले में बड़ी राहत मिली है। दिल्ली की साकेत कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए एलजी वीके सक्सेना को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। साकेत कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद यह माना कि मानहानि के आरोप साबित नहीं हो पाए। इसके बाद कोर्ट ने एलजी विनय कुमार सक्सेना को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। इस फैसले को एलजी वीके सक्सेना के लिए एक बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद उनके खिलाफ लंबित मानहानि मामला समाप्त हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े एक कथित विज्ञापन से संबंधित है, जिसे नवंबर 2000 में वीके सक्सेना द्वारा प्रकाशित किया गया था। आरोप था कि इस विज्ञापन में मेधा पाटकर को निशाना बनाया गया और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया गया। इसी को लेकर पाटकर ने सक्सेना के खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी।
गौरतलब है कि इससे पहले 25 जनवरी को दिल्ली की एक अदालत ने मेधा पाटकर को वीके सक्सेना द्वारा दायर एक आपराधिक मानहानि मामले में बरी कर दिया था। यह मामला 2006 में एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान पाटकर द्वारा की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि उस मामले में वीके सक्सेना मूल रिकॉर्डिंग उपकरण या पूरा वीडियो रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहे, जो आरोपों की पुष्टि के लिए आवश्यक था। सबूतों के अभाव में अदालत ने पाटकर को दोषमुक्त कर दिया था।
दोनों मामलों की पृष्ठभूमि
दोनों ही मामले नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान हुई तीखी सार्वजनिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और मीडिया बयानों से जुड़े रहे हैं। अदालतों ने अपने-अपने आदेशों में यह स्पष्ट किया कि मानहानि जैसे मामलों में ठोस और प्रमाणिक साक्ष्य बेहद जरूरी होते हैं।
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