हर्षित तिवारी, खातेगांव (देवास)। खेती…जिसे अक्सर केवल परंपरा या आजीविका का साधन माना जाता है, लेकिन जब इसमें सही सोच, निरंतर मेहनत और आधुनिक तकनीक का समावेश हो जाए, तो यही खेती मुनाफे का मजबूत और सम्मानजनक व्यवसाय बन जाती है। आज की यह स्पेशल स्टोरी ऐसे ही एक प्रगतिशील किसान की है, जिन्होंने परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए नई राह चुनी। जहां एक किसान अपनी मेहनत और नवाचार से पूरे इलाके के लिए मिसाल बन गया है।
देवास जिले के खातेगांव से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम इकलेरा। यही गांव है उस किसान का, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर सोच बदली जाए तो खेती की तस्वीर भी बदली जा सकती है। हम बात कर रहे हैं किसान ओम कुड़िया की, जो बीते 11 वर्षों से खेती को नए आयाम दे रहे हैं। जहां खातेगांव और आसपास के क्षेत्रों में हजारों किसान आज भी गेहूं, चना, मूंग और धान जैसी परंपरागत फसलों पर निर्भर हैं। वहीं ओम कुड़िया ने जोखिम उठाते हुए अलग रास्ता चुना। उन्होंने 10 एकड़ भूमि में उन्नत और नकदी फसलों की खेती शुरू की और धीरे-धीरे इसे सफल मॉडल में बदल दिया।
किसान की सोच और शुरुआत
किसान ओम कुड़िया बताते हैं कि शुरुआत आसान नहीं थी। नई फसलें, नई तकनीक और बाजार की समझ-सब कुछ सीखना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अलग-अलग स्थानों पर जाकर खेती देखी, सफल किसानों से बातचीत की, कृषि विशेषज्ञों की सलाह ली और फिर अपने खेत में प्रयोग शुरू किए। उनका कहना है कि खेती केवल बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं है। इसमें सही योजना, समय पर निर्णय और आधुनिक तकनीक का बड़ा महत्व है। यही सोच उन्हें परंपरागत खेती से आगे ले गई।

फसलों की विविधता-सफलता की कुंजी
आज ओम कुड़िया के खेतों में टमाटर, एप्पल बेर, हरी मिर्च और ड्रिप सिस्टम से चने की खेती हो रही है। फसलों की यह विविधता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। एक फसल से नुकसान हो तो दूसरी फसल उससे भरपाई कर देती है। वे बताते हैं कि फसल चयन करते समय उन्होंने बाजार की मांग, लागत और मुनाफे-तीनों बातों को ध्यान में रखा। इसी वजह से उनकी खेती आज लाभ का व्यवसाय बन चुकी है।
एप्पल बेर की खेती-दीर्घकालीन लाभ
एप्पल बेर ओम कुड़िया की खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे बताते हैं कि यह एक दीर्घकालीन और बेहद लाभकारी फसल है। एक बार एप्पल बेर का पौधा लगाने के बाद यह 25 से 30 वर्षों तक लगातार उत्पादन देता है। सही देखरेख, समय पर छंटाई और उचित खाद प्रबंधन से इसमें अच्छा मुनाफा मिलता है। ओम कुड़िया का कहना है कि एप्पल बेर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी मांग लगातार बनी रहती है। स्थानीय बाजार के साथ-साथ यह फसल दूर की मंडियों में भी आसानी से बिक जाती है।

हरी मिर्च की खेती-अनुभव से सफलता तक
हरी मिर्च की खेती वे काफी लंबे समय से कर रहे हैं। किसान बताते हैं कि शुरुआत में मिर्च की खेती सीखने में समय लगा। रोग, कीट और बाजार की अनिश्चितता-इन सभी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन अनुभव के साथ सब आसान होता गया। आज स्थिति यह है कि मिर्च की खेती उनके लिए एक भरोसेमंद आय का साधन बन चुकी है। हरी मिर्च की खेती में प्रति एकड़ लगभग 50 से 70 हजार रुपये की लागत आती है, जबकि उत्पादन 300 से 400 क्विंटल तक प्राप्त हो जाता है। सही समय पर सही मंडी मिलने से किसानों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है।
टमाटर की खेती- नर्सरी से मंडी तक
टमाटर की खेती में ओम कुड़िया की खास पहचान है। वे स्वयं टमाटर की नर्सरी तैयार करते हैं, जिससे पौधों की गुणवत्ता बनी रहती है और लागत भी कम होती है। उनके अनुसार, एक एकड़ में लगभग 2500 से 3000 क्रेट तक टमाटर का उत्पादन लिया जा सकता है। वे बताते हैं कि टमाटर की खेती में समय पर सिंचाई, संतुलित खाद और रोग नियंत्रण बेहद जरूरी है। सही प्रबंधन के साथ यह फसल किसानों को अच्छी आमदनी दे सकती है। उनकी उपज प्रदेश की अलग-अलग जिलों की मंडियों में भेजी जाती है, जहां उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं।

ड्रिप सिस्टम से चने की खेती- तकनीक का सही उपयोग
परंपरागत चना खेती में जहां कई बार फसल रोगों और मौसम की मार से प्रभावित होती है, वहीं ओम कुड़िया ने इसमें भी आधुनिक तकनीक अपनाई है। उन्होंने चने की खेती में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाया है, जिससे हर पौधे की जड़ तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचता है। किसान बताते हैं कि ड्रिप सिस्टम से न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि बारिश के समय भी फसल को नुकसान नहीं होता। कई किसानों को चने में पीला मोजेक जैसी बीमारी का सामना करना पड़ता है, लेकिन ड्रिप सिस्टम से उनकी फसल काफी हद तक सुरक्षित रहती है।
ड्रिप पाइपलाइन और नई तकनीक
ओम कुड़िया के खेत में लगी ड्रिप पाइपलाइन की शुरुआत फिल्टर से होती है। यह फिल्टर रेत और मिट्टी को छानकर साफ पानी पौधों तक पहुंचाता है। ड्रिप सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके माध्यम से खाद और पानी एक साथ दिया जा सकता है। इससे समय, पानी और लागत-तीनों की बचत होती है। किसान बताते हैं कि सिर्फ एक वाल्व सिस्टम घुमाने से पूरी सिंचाई और खाद प्रबंधन संभव हो जाता है। यही तकनीक खेती को आसान और लाभकारी बनाती है।

किसान का संदेश और प्रेरणा
ओम कुड़िया कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी सीखा, वह अपने अनुभव और मेहनत से सीखा। आज स्थिति यह है कि न केवल उनके क्षेत्र के किसान, बल्कि आसपास के जिलों से भी लोग उनकी खेती देखने और सीखने आते हैं। उनका साफ संदेश है कि अगर किसान मेहनत के साथ नई तकनीक अपनाएं, फसलों में विविधता लाएं और सरकार की कृषि योजनाओं का सही लाभ लें, तो खेती निश्चित रूप से घाटे का नहीं, बल्कि मुनाफे का धंधा बन सकती है।
इकलेरा के किसान ओम कुड़िया की यह कहानी उन लाखों किसानों के लिए प्रेरणा है, जो बदलाव से डरते हैं। यह कहानी बताती है कि खेती में भविष्य तभी उज्ज्वल है, जब परंपरा के साथ नवाचार जुड़ जाए। सही सोच, आधुनिक तकनीक और सीखने की ललक-यही तीन मंत्र हैं, जो खेती को आत्मनिर्भरता और समृद्धि की ओर ले जाते हैं।
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