विशेष : DKS सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का सच ! यहाँ आने वाले मरीजों को ज़िंदगी नहीं मिलती दोबारा ? 5 महीने में 1000 मौतें !

वैभव बेमेतरिहा/ सत्यपाल सिंह, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का दाऊ कल्याण सिंह सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में अगर आप जीवन और मृत्यु के बीच इलाज के लिए पहुँच रहे हैं तो जरा सावधान हो जाइए ! क्योंकि यहाँ आपको नई ज़िंदगी मिले इसकी गारंटी नहीं ! हाँ मौत आपके सामने यहाँ पर हर घड़ी खड़ी है. जी हाँ डीकेएस में जब हमने मौत के आंकड़ों और यहाँ आने वाले मरीजों की जानकारी जुटाई तो जो सच सामने आया है वह बेहद डरा देने वाला है ! यकीन करना बेहद मुश्किल है कि बीते 5 महीने में 900 से अधिक लोगों की मौत हो यहाँ हो चुकी है !

इस असपातल में हर महीने का मौत के आंकड़ों औसत 25 प्रतिशत से अधिक  है. मतलब हर 100 मरीज में 25 से 28 की मौत तय है ! आइए आपको हम महीनेवार जरा सुपरस्पेशिलिटी हॉस्पिटल में मृत्यु दर के आंकड़ें बताते हैं-
दिसबंर में 25.6 प्रतिशत रहा मृत्यु दर का आंकड़ा
जनवरी- 20.3 प्रतिशत रहा मृत्यु दर का आंकड़ा
फरवरी- 29.4 प्रतिशत रहा मृत्यु  दर का आंकड़ा
मार्च – 32.8 प्रतिशत रहा मृत्यु का आंकड़ा
अप्रैल-29.8 प्रतिशत रहा मृत्यु का आंकड़ा

विशेषज्ञों ने कहा सिर्फ नाम का है, व्यवस्था तो सुपर क्लास की है ही नहीं
जब इस मामले में हमने अस्पताल की व्यवस्थाओं की पड़ताल की और विशेषज्ञों से बातचीत की तो पचा कि यहाँ डॉक्टरों की कमी तो है यहाँ की सबसे बड़ी कमी है ट्रामा सेंटर का न हो. नतीजा एक्सीडेंट के जो केस आते हैं उसमें फिर मरीज को बचा पाना मुश्किल हो जाता है. एक डॉक्टर ने कहा हॉटल(रेस्टोरेंट) का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस तरह से कोई भी होटल सिर्फ पनीर की सब्जी के भरोसे नहीं चल सकता उसके लिए वहाँ पर चावल, दाल, तड़का, रोटी की भी जरूरत होती है वैसे ही एक सुपर क्लास अस्पताल में सिर्फ नाम रखकर खोल देने से नहीं होता वहाँ वे सारी सुवधिाएं भी होनी चाहिए जिससे उनका इलाज हर स्तर पर किया जा सके.

मृत्य दर नहीं बढ़ी,  ज्यादातर ब्रेन डेथ आते हैं
वहीं इस मामले में डीकेएस के अधीक्षक के.के सहारे इस बात इंकार करते हैं यहाँ आने वाले मरीजों की मौत की संख्या लगातार बढ़ रही है. उनका कहना है कि मृत्यु दर नहीं बढ़ी है. हाँ ये जरूर है कि यहाँ आने वाले मरीजों की संख्या में कई गुना तक वृद्धि हुई है. हमारे वैसे भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. हमारे यहाँ न्यूरो, बर्न, नेफ्रोलॉजी से जुड़े केस ज्यादा आते हैं. इन विभागों में 150-150 मरीजों की संख्या होती है.  ज्यादातर ब्रेन डेथ की स्थिति में आते हैं. एक्सीडेंट की घटना में 90 प्रतिशत मरीज ब्रेन खराब होने की दशा में आते हैं. हमारी कोशिश है रहती है कि हर मरीज को बचा सके. लेकिन फिर जो आंकड़े मौत को लेकर सामने आए हैं उसे कम करने की दिशा में जरूर ठोस काम करेंगे.

आदिले के पास जवाब नहीं 
जबकि चिकित्सा शिक्षा संचालक डॉ एसएल आदिले इस संबंध में बात करने के लिए संपर्क किया तो उन्हें खुद को हद से ज्यादा व्यस्त बताते हुए फोन काट दिया. हमने दूसरे दिन फिर से उनसे बात करने की कोशिश के लिए उन्होंने मीटिंग में कहते हुए बात नहीं की. उनके इस आचरण से यह साफ था कि वह इस पर जवाब देने से बच रहे हैं. वे क्यों बात नहीं करना चाहते यह समझ से परे ?

इस पूरे मामले में पड़ताल के दौरान जो महत्वपूर्ण बात निकलकर सामने आई वह यह कि यहाँ डेथ रिव्यू कमेटी अब तक गठित नहीं की गई. वही कमेटी जो मौत के आंकड़ों की समीक्षा करके अपनी रिपोर्ट देते हैं. मतलब सुपर क्लास अस्पताल में मौत का सच किसी के पास नहीं है और जो सच है वो ये है कि यहाँ मौत के आगे ज़िंदगी बेबस नज़ऱ आती है.

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