आशुतोष तिवारी, जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का दरबार सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि लाखों दिलों की उम्मीदों का ठिकाना भी है। जब मंदिर की 9 दान पेटियां खोली गईं तो उनमें करीब 19 लाख रुपये कैश तो मिले ही, लेकिन इन पैसों के साथ चिट्ठियां भी निकली, जिनमें श्रद्धालुओं ने अपने दिल का हाल माता तक पहुंचाया था। किसी ने कांपते हाथों से नौकरी की आस लिखी तो किसी ने टूटे मन से अपने प्यार को पाने की गुहार लगाई। किसी ने परीक्षा पास कराने की प्रार्थना की तो किसी ने बीमारी से जूझते परिवार के लिए राहत मांगी। हर चिट्ठी अपने आप में संघर्ष, भरोसे और उम्मीद की एक कहानी थी।
एक युवती ने माता को लिखे पत्र में भरोसे से कहा, मां आपके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं जाता। नौकरी के लिए आवेदन भरा है, परीक्षा होने वाली है। पास करवा दीजिए, नौकरी लगवा दीजिए। उसी पत्र में उसने अपने प्रेम का भी जिक्र किया और लिखा – मैं एक लड़के से प्यार करती हूं। हमारे घरवाले मान जाए, हम दोनों की शादी हो जाए। मां, हम पर अपना आशीर्वाद बनाए रखना।

नौकरी के लिए माता से लगाई गुहार
वहीं दो पन्नों में लिखे एक अन्य पत्र में एक परिवार की पूरी पीड़ा उकेरी गई थी। पत्र में लिखा था कि घर में कमाने वाला सिर्फ एक ही है, उसी पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। दूसरे रिश्तेदार ने नौकरी की परीक्षा दी है, उसका भी नौकरी लग जाए। बीमारी से जूझ रहे परिजनों के लिए स्वस्थ होने की मन्नत भी उसी चिट्ठी में मांगी गई थी।

भक्त ने पत्र में लिखा – बिछड़े हुए प्यार को मुझसे मिला दीजिए…
एक और भक्त ने बेहद भावुक शब्दों में अपने टूटे प्रेम की कहानी लिखी। उसने बताया कि वह जिस लड़की से प्रेम करता था, पारिवारिक मजबूरियों के चलते दोनों अलग हो गए। पत्र में लिखा था कि, मां मैं उसी के साथ अपना पूरा जीवन बिताना चाहता हूं। वो जैसी भी हो, अच्छी या बुरी, मेरा सब कुछ उसी को समर्पित है। मेरे बिछड़े हुए प्यार को मुझसे मिला दीजिए।
दान पेटियों से निकली ये चिट्ठियां बताती हैं कि मां दंतेश्वरी का दरबार सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि उन लोगों की आखिरी उम्मीद है, जिनकी बातें दुनिया सुन नहीं पाती। यहां सिक्कों की खनक से ज़्यादा, भरोसे की आवाज़ गूंजती है और शायद इसी भरोसे के कारण भक्त आज भी खाली हाथ नहीं लौटने की आस लेकर दरबार तक पहुंचते हैं।
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