अमित पांडेय, डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ को फिर एक नए सपने की सौगात दी जा रही है। अमृत मिशन 2.0 के तहत शहर का जियोस्पेशल मास्टर प्लान बनेगा, ड्रोन से सर्वे होगा और 2041 तक के विकास का नक्शा तैयार किया जाएगा। कागज़ पर यह सब बेहद आकर्षक लगता है, लेकिन जमीन पर खड़े होकर देखें तो सवाल खुद-ब-खुद उठता है, जब मौजूदा योजनाएं ही दम तोड़ चुकी हैं, तो नया मास्टर प्लान किस भरोसे चलेगा? डोंगरगढ़ में आज एक साथ प्रसाद योजना, शक्तिपीठ योजना और अमृत भारत स्टेशन योजना लागू हैं। बजट आया, काम हुआ, उद्घाटन भी हुए। इसके बावजूद शहर की हकीकत यह है कि सुविधाएं या तो अधूरी हैं या फिर बंद पड़ी हैं।

स्टेशन ‘अमृत’, सुविधा बीमार

अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन को चमकाया गया। स्वचालित सीढ़ियां, लिफ्ट और आधुनिक इंतज़ाम किए गए। लेकिन मौजूदा स्थिति यह है कि अधिकतर सुविधाएं बंद हैं। बुज़ुर्ग यात्री, महिलाएं और दिव्यांग आज भी वही पुरानी सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं। सवाल उठता है, अगर रख रखाव नहीं करना था, तो इतनी महंगी सुविधाएं लगाई ही क्यों गईं?

प्रसाद योजना-आस्था है, व्यवस्था नहीं

मां बम्लेश्वरी मंदिर जैसे बड़े आस्था केंद्र के लिए प्रसाद योजना शुरू की गई। उद्देश्य था श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा और डोंगरगढ़ को पर्यटन के नक्शे पर मजबूती से खड़ा करना। लेकिन श्रद्धालुओं की शिकायत है कि व्यवस्थाएं टिकाऊ नहीं हैं। कहीं काम अधूरा है, तो कहीं शुरू होकर थम गया। करोड़ों खर्च के बाद भी आम भक्त को सुविधाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। करोड़ो की लागत से बने श्रीयंत्र से डोंगरगढ़ को क्या फायदा मिलेगा यह तो पता नहीं लेकिन श्रीयंत्र बनाने वाले जिम्मेदारों के घर धन वर्षा जरूर हो गई है। यही हाल शक्तिपीठ योजना का है इस योजना से डोंगरगढ़ को धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनाने की बात हुई। लेकिन ज़मीन पर देखें तो न तो सुनियोजित ढांचा दिखता है और न ही स्थायी व्यवस्थाएं। घोषणा और हकीकत के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है।

डोंगरगढ़ की सबसे बड़ी समस्या योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि निगरानी और जवाबदेही का अभाव है। जब तक यह तय नहीं होगा कि सुविधा बंद होने पर कौन जिम्मेदार है, तब तक हर नई योजना पुरानी योजनाओं की तरह सिर्फ फाइलों में सिमटती रहेगी। अब जबकि जियोस्पेशल मास्टर प्लान की बात हो रही है, तो ज़रूरत इस बात की है कि पहले मौजूदा योजनाओं की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, बंद पड़ी सुविधाओं को चालू किया जाए और रख रखाव की स्थायी व्यवस्था बने। वरना डर यही है कि डोंगरगढ़ का नया मास्टर प्लान भी भविष्य का सपना बनकर रह जाएगा, और वर्तमान सवाल बनकर हमेशा खड़ा रहेगा।