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सियासत के दो ध्रुव साथ-साथ आसमां की ऊंचाई पर रहे और जमीं से सबकी निगाहें इन पर टिकी रही

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रायपुर- दिल्ली से साथ उड़े, लेकिन दिल नहीं मिले. आस-पास ही बैठें, लेकिन दूरियां बरकरार रही। घंटें-दो घंटें का सफर रहा, लेकिन नजरें तक इनायत ना हुई. साहब सीट नंबर 1 पर थे, तो जनाब सीट नंबर 12ए पर. अंदर चहल-पहल थी, लेकिन साहब और जनाब के बीच खामोशियां थी. सत्ता और विपक्ष के बीच लकीरें जब खींचती हैं, तो उसे इस रूप में देखा जा सकता, जैसा 22 अगस्त को दिल्ली से रायपुर तक आसमान के ऊपर सफर करते हुए उन आम लोगों ने देखा होगा जिन्हें सियासी उठा-पठक, खींचतान में दिल्लचस्पी होगी.  हालांकि आम लोगों की संख्या इसमें गिने-चुने भी हो सकती है, लेकिन मीडिया के लिए बेहद दिलचस्पी का विषय था.  लिहाजा मीडिया ने बाहर जो देखा उसके बाद अपने आचरण के मुताबिक सफर के दौरान ऊपर जहाज में क्या हुआ होगा इससे जानने की कोशिश की, भरपूर की.  वैसे मीडिया की कोशिश से कहीं ज्यादा उस कोशिश जानना ज्यादा जरूर जिसके लिए साहब और जनाब दोनों दिल्ली गए थे.  मसलन साहब कौन ये भी समझ गए होंगे और कौन से जनाब की बात कर रहे हैं वो भी.

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बात सूबे के मुखिया डॉ. रमन सिंह की और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के मुखिया भूपेश बघेल. सत्ता और विपक्ष के दो प्रमुख एक ही वक्त में दिल्ली दौरे पर थे.  नई बात नहीं बता रहे हैं सब जानते ही है. जनाब बघेल गाय पर मचे हाय-हाय पर आलाकमान को रिपोर्ट देने गए थे, तो डॉ. साहब सरकार की कामकाज की जानकारी देने. लेकिन खबर तो ये है कि गाय की भूख से मौतों पर सियासी उबाल का असर दिल्ली में भी दिखा है.  रिपोर्ट पीएम के पास भी पहुँची और शाह तक भी.  मौजूदा वक्त में एक के बाद एक हुई बीते कुछ घटनाओं से सरकार परेशान रही है.  रिसॉर्ट से उबर भी नहीं पाई थी कि गाय के मामसले फंसे और फिर इसी बीच सरकारी अस्पताल में गोरखपुर जैसा अॉक्सीजन कांड ने परेशानी और बढ़ा दी.  लाजिमी है इन परेशानियों को विपक्ष ने खूब भूनाया, बढ़ाया है. और इसमें आमने-सामने वहीं दो चेहरे टकराते रहे हैं, जो 22 अगस्त को सफर में साथ- साथ तो थे, लेकिन दूरियां नदी के दो किनारे की तरह रही है और अंत में जवाब इस सवाल के साथ ही कि इन दोनों किनारे की बीच सियासी नदी ही बह रही है.

 

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