हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश में साफ पानी सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित रह गया है। जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में पीने का पानी ही लोगों की बीमारी और मौत की वजह बनता जा रहा है। मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य कार्य योजना 2022–27 के आंकड़े एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक सिर्फ 5 साल (2016 से 2020) में राज्य के 10 जिलों में 18 लाख 93 हजार 673 लोग पानी से होने वाली बीमारियों से प्रभावित हुए। ये सभी बीमारियाँ ऐसी हैं, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता था, अगर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती।

2019 में हालात सबसे बदतर, आधे लाख से ज्यादा लोग बीमार

आधिकारिक तालिका बताती है कि 2019 में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर रही। उस एक साल में ही भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, विदिशा जैसे जिलों में 5 लाख 11 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए। डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और दूसरी जलजनित बीमारियाँ लगातार लोगों को अपनी चपेट में लेती रहीं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई ठोस सुधार नजर नहीं आया।

इंदौर जैसे शहरों में भी पानी सुरक्षित नहीं

हालांकि तालिका में इंदौर का नाम शामिल नहीं है, लेकिन हेल्थ डेटा और हालिया घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि इंदौर, भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर जैसे शहरी इलाकों में पानी की गुणवत्ता पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। इंदौर में बीते वर्षों में दूषित पानी से बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, मौतें हुईं और अस्पतालों पर दबाव बढ़ा, लेकिन नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही तय नहीं हुई।

CAG पहले ही कर चुका था बड़ा खुलासा

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट नंबर 3/2019 सरकार की पोल पहले ही खोल चुकी है। इस रिपोर्ट के अनुसार इंदौर और भोपाल नगर निगमों ने 8.95 लाख परिवारों को दूषित पेयजल सप्लाई किया। वहीं पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने 2013 से 2018 के बीच 5.45 लाख पानी से होने वाली बीमारियों के मामले खुद दर्ज किए। यानि सरकार को सब कुछ पता था, फिर भी हालात नहीं सुधरे। आज भी अखबारों में भोपाल की झुग्गियों में दूषित पानी मिलने की खबरें सामने आ रही हैं। सवाल साफ है- जब खतरा पहले से मालूम था, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है?

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने सीधे तौर पर सरकार से सवाल पूछा है कि क्या CAG और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के बाद प्रभावित परिवारों की कोई जांच की गई? अगर की गई है, तो उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और अगर नहीं की गई, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया की कड़ी मांगें

  • मध्य प्रदेश के सभी जिलों में तत्काल जल ऑडिट कराया जाए।
  • CAG की सिफारिश के अनुसार हर 15 दिन में पानी की जांच हो और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
  • पूरे राज्य में पानी से होने वाली बीमारियों पर सर्वे कर 15 दिनों में रिपोर्ट जारी की जाए।
  • दूषित पानी से मौत पर दिया जा रहा 2 लाख रुपये का मुआवजा बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये किया जाए।
  • इंदौर समेत सभी प्रभावित शहरों के लिए समय-सीमा वाला हेल्थ एडैप्टेशन और वॉटर सेफ्टी प्लान तैयार किया जाए।

साफ पानी नहीं तो बीमारी तय

जन स्वास्थ्य अभियान का साफ कहना है कि अगर अब भी कठोर फैसले नहीं लिए गए, तो हजारों लोगों की जान हर साल ऐसे ही खतरे में पड़ती रहेगी। साफ और सुरक्षित पीने का पानी कोई योजना या नारा नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। अब सवाल यह नहीं है कि समस्या क्या है, सवाल यह है कि सरकार कब जागेगी और कब जिम्मेदारी तय होगी।

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