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फीचर स्टोरी. बस्तर में नक्सलवाद से कहीं ज्यादा अब बदलावों की कहानियां सुनाई पड़ती है, दिखाई देती है. दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा से लेकर अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर कांकेर तक हर ओर, हर छोर पर अब नवा बस्तर है. नवा छत्तीसगढ़ है.


नवा बस्तर में अब स्वालंबी बनते आदिवासी, आर्थिक संपन्न होते वनवासी मिलेंगे. मिलेंगी वो आदिवासी महिलाएं, आदिवासी लड़कियां, जो मजबूत इरादों के साथ चुनौतियों के बीच बस्तर में मिसाल कायम कर रही हैं. आइए इस रिपोर्ट के जरिए आपको बताते हैं आखिर बस्तर में बदलाव की तीन प्रेरक कहानी कौन-कौन सी है ? आखिर कैसे योजनाओं से आदिवासी लड़कियों की जिंदगी बदल रही है ?

दिव्यांगता बाधा नहीं, हारने का इरादा नहीं
बदलाव की ये पहली कहानी है दिव्यांग एवंती की. एवंती न बोल पाती और न ही सुन पाती है, लेकिन एवंती ने दिव्यांगता की कमजोरी को कभी भी अपने इरादों पर हावी होने नहीं दिया. मजबूत इरादों के बल पर सरकारी योजनाओं की मदद से उन्होंने खुद न सिर्फ साबित किया, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन गई.

एवंती कोंडागांव जिले के नक्सल प्रभावित मर्दापाल के पास बादालूर की रहने वाली है. एवंती अपने परिवारवालों के लिए बोझ नहीं बनना चाहती थी. लिहाजा एवंती स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जुट गई. एवंती को मदद राज्य सरकार की ओर संचालित योजना से मिली. मददगार बना जिला प्रशासन कोंडागांव. एवंती को गारमेंट फैक्ट्री में काम मिला. काम से पहले एवंती को प्रशिक्षण दिया गया. एवंती अब सिलाई सीख कर अपने पैरों पर खड़ी हो गई है. राज्य सरकार द्वारा संचालित गारमेंट फैक्टरी में काम कर उसने अपनी दिव्यांगता को भी मात दे दी है.


एवंती के आत्मनिर्भर बनने की कहानी की शुरुआत कलेक्टर जनदर्शन से हुई. दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने अपने परिजनों एवं शिक्षकों से आत्मनिर्भर बनने की इच्छा जाहिर की. एवंती ने अक्टूबर 2021 में आवेदन किया. कलेक्टर पुष्पेन्द्र कुमार मीणा ने आजीविका मिशन के सहायक परियोजना अधिकारी पुनेश्वर वर्मा को उसे गारमेंट फैक्ट्री में कार्य करवाने के निर्देश दिए.

पुनेश्वर वर्मा के मुताबिक गारमेंट फैक्ट्री खुलते ही एवंती से संपर्क कर उसे क्वालिटी टेस्टिंग के साथ स्टीचिंग का प्रशिक्षण दिया गया. सबसे बड़ी समस्या एवंती के सुनने एवं बोलने की दिक्कत के कारण थी. ऐसे में फैक्ट्री की अन्य लड़कियों और ट्रेनरों का उसे पूरा सहयोग किया. धीरे-धीरे वह अपने काम में प्रवीण होती गई.


एवंती का काम करते देखकर भविष्य में 30 से 40 दिव्यांग बालिकाओं, 30 विधवा और परित्यक्ता महिलाओं को प्रशिक्षण देकर फैक्ट्री में काम देने की पहल की जा रही हैं. वर्तमान में 150 से अधिक लड़कियां फैक्ट्री में कार्य कर रही हैं. उनके द्वारा विख्यात कम्पनी डिक्सी स्कॉट के कपड़ों का निर्माण किया जा रहा है. अब तक उनके द्वारा एक करोड़ रुपए के कुल 01 लाख कपड़ों का निर्माण किया जा चुका है.

सोनम का दम, नहीं किसी से कम
बस्तर में बदलाव की ये दूसरी कहानी है नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले में सोनम मरकाम की. कटेकल्याण की रहने वाली सोनम एक घरेलु आदिवासी महिला से अब एक काम-काजी नौकरीपेशा महिला बन चुकी हैं. सोनम ने अपने कामों से यह बताया दिया है कि वह किसी से कम नहीं है.


सोनम मरकाम की कहानी की शुरुआत डेनेक्स से होती है. डेनेक्स यानी दंतेवाड़ा नेक्सट. डेनेक्स दरअसल सोनम जैसी ही सैकड़ों महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने वाली एक सरकारी कंपनी है. इस कंपनी का संचालन जिला प्रशासन की ओर से किया जाता है. यह एक गारमेंट कंपनी है. इसी कंपनी में काम करती हैं सोनम मरकाम.


कटेकल्याण से 10 किमी दूर रहने वाली सोनम मरकाम अपने दो साल के बच्चे के साथ संयुक्त परिवार में रहती हैं. सोनम के परिवार में कुल 6 सदस्य हैं, लेकिन कमाने वाला सिर्फ एक सोनम का पति ही था. सोनम को सिलाई का शौक था. सोनम का यह शौक पूरा हुआ डेनेक्स से. शौक ही पूरा नहीं हुआ, बल्कि आय का एक बड़ा जरिया भी बन गया.


डेनेक्स में काम करने के लिए सोनम रोजाना 10 किमी दूर से बस में बैठकर आती है और वापस जाती है. आज सोनम हर महीने 7 हजार रुपए कमा रही है. सोनम की तरह ही 100 अन्य महिलाएं भी डेनेक्स कटेकल्याण में काम कर रही हैं और आर्थिक स्वावलंबन का इतिहास रच रही हैं.


बस्तर की नारी है, हौसला भारी है

बस्तर में बदलाव की ये तीसरी प्रेरक कहानी कोंडागांव जिले की है. कोंडागांव में मर्दापाल में रहने वाली दिव्यांग सुशीला सोढ़ी की. सुशीला उन लोगों के लिए मिसाल है, जो दिव्यांगता को अपनी कमजोरी समझ हिम्मत हार जाते हैं. सुशाली ने मेहनत के बल पर सरकारी योजनाओं से न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि वह दूसरों के लिए प्रेरणा है.


सुशीला वनपोज संग्रहण के कार्य से जुड़ी हैं. सुशीला को संग्रहण नीति का आज पूर्ण लाभ मिल रहा है. सुशीला संग्राहकों से वनोपज सरकारी दर में संग्रह करती हैं. सुशीला अपने साथ-साथ मर्दापाल क्षेत्र के अनेक वनोपज संग्राहकों को अपने पैरों पर खड़े होने और आर्थिक, सामाजिक समृद्ध जीवन जीने के लिए तैयार कर रही हैं. वे संग्राहकों से शासकीय मूल्य पर वनोपज खरीदती हैं. इस सीजन में 3 लाख की खरीदी की है.


वे बताती हैं कि व्यापारी ईमली 25 रुपए में लेते हैं, जबकि शासकीय रेट 33 रुपए है, साल बीज का शासकीय रेट 20 रुपए है, व्यापारी 12 से 15 रुपए में देते हैं. आज वनोपज खरीदी की उचित व्यवस्था और सरकार द्वारा वनोपज नीति के जमीनी स्तर पर बेहतर क्रियान्वयन से हम सबके जीवन में खुशहाली और समृद्धि आई है.


वास्तव में आत्मनिर्भरता के साथ नवा बस्तर को गढ़ने में लगी तीन आदिवासी युवतियों की यह प्रेरक कहानी सच में बस्तर में बदलाव की कहानी है. सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन जब बेहतर तरीके होता है, तब उसका व्यापक असर भी दिखता है.