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पंकज तिवारी. रायपुर. जलेबी भारत की राष्ट्रीय मिठाई है और यह मिठाई आपको भारत के कोने-कोने में मिल जाएगी. हर जगह की जलेबी का स्वाद लाजवाब होता है. सर्दियों का मौसम हो गरमा-गरम जलेबी का मज़ा ही अलग होता है. ये मिठाई न सिर्फ हमारे देश में बल्कि पूरे विश्व में भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाती है. भारत में कुछ शहरों की जलेबी का स्वाद इतना प्रसिद्ध है कि वहां के नगरीय निकायों ने क्षेत्र विशेष व चौक-चौराहो का नाम तक जलेबी चौक रखा है. इससे साफ हो जाता है जलेबी हमारे लिए कितनी खास है.
पांच शहर जहां जलेबी की है अलग पहचान
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बात करें जलेबी चौक की तो कई राज्यों में एक ना एक शहर के चौक का नामकरण इस दिल को छू लेने वाली मिठाई के नाम पर जरूर मिल जाएगा. यहां हम ऐसे ही पांच शहरों का जिक्र कर रहे हैं.
भिलाई का जलेबी चौक
छह दशक से जलेबी का वही स्वाद, जिसमें भी चखा बस रहे ही बोला… मजा आ गया. यहां की जलेबी के दीवाने ट्विनसिटी के लोग ही नहीं फिल्म स्टार भी हैं जो शूटिंग में भिलाई आए थे और सुबह-सुबह जलेबी खाने पहुंच जाया करते थे. जलेबी चौक की इस दुकान की खास बात यह है कि यहां की जलेबी के लोग इतने दीवाने है कि सुबह से शाम तक सौ किलो से ज्यादा जलेबियां बिक जाती है. सर्द मौसम में इसकी संख्या दो गुना हो जाती है. भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना (1955) के समय इस दुकान को खोला गया था.
खंडवा का जलेबी चौक
खंडवा के प्रमुख चौक-चोराहों में एक ये चौक धार्मिक चल समारोह का भी प्रमुख केंद्र है. यहां मिलने वाली दूध-जलेबी या मावा जलेबी बहुमुखी प्रतिभा के धनी, अभिनेता, गायक किशोर कुमार को भी पसंद थी. किशोर कुमार जब भी खंडवा जाते, वे लाला जलेबी वाले के यहां जरूर पहुंचते थे. किशोर कुमार हमेशा कहा करते थे- दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जायेंगे. खंडवा की पहचान किशोर कुमार खंडवे वाले के नाम से भी होती है. आज भी उनकी स्मारक पर आने वाले लोग उन्हें दूध-जलेबी का भोग लगाते हैं.
नई दिल्ली का जलेबी चौक
दिल्ली के सुल्तानपुरी क्षेत्र का जलेबी चौक हमेशा से ही राजनीति गलियारों में गरमा गरम ही रहता है. यहां आए दिन पार्टियों के प्रदर्शन होते हैं. ऐतिहासिक चांदनी चौक में यहां कि दुकानें वर्ष 1954 से जलेबी में नाम कमा रही है. यहां देसी घी और जेलबा के साथ रबड़ी के लोग दिवाने हैं.
हिसार का जलेबी चौक
दक्षिणी हरियाणा को दूसरों राज्यों से जोडऩे के लिए बनाया गया साउदर्न बाईपास यानी जलेबी चौक स्वाद के लिए ना हो खूबसूरती के लिए अपनी पहचान रखता है. जलेबी चौक उत्तर से पश्चिम को जोडऩे वाला नया हाईवे है. इससे पांच राज्यों को रास्ता जाता है. इनमें पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली शामिल हैं. इस मतलब ये नहीं है कि हरियाणा में जलेबी की डिमांड कम है. गोल घेराली पीपली, डाल्है-डाल्है रस. बताना हो तै बता दे, ना तै रपिए दे दे दस.. ये हरियाणा की एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक पहेली है, जिसे हरियाणावासी बहुत पुराने समय से बुझाते चले आ रहे हैं और इस पहेली का जवाब है ‘जलेबी’. हरियाणा में जलेबी का स्वाद हर छोटी-बड़ी जगह पर मिल जाएगा. लेकिन यहां के गोहना की जलेबी को विश्व प्रसिद्धि मिली है. मातुराम की जलेबी के नाम से फेमस हरियाणा के अन्य शहरों में भी मिल जाएगी.
जयपुर का जलेबी चौक
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जलेबी चौक आमेर महल के चार प्रमुख प्रांगणों में से एक है जिसका निर्माण सवाई जय सिंह के शासनकाल के बीच किया गया था. यहां सेना नायकों जिन्हें फ़ौज बख्शी कहते थे, उनकी कमान में महाराजा के निजी अंगरक्षकों की परेड भी आयोजित हुआ करती थीं. जलेबी अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है सैनिकों के एकत्रित होने का स्थान. यह महाराजा उन रक्षकों की टुकडिय़ों की सलामी लेते व निरीक्षण किया करते थे. चौक की जलेबी भले ही प्रसिद्ध ना हो लेकिन जयपुर की दूध-जलेबी का हर कोई मुरीद है.
13वीं शताब्दी में बुक में भी जलेबी की रेसिपी प्राचीन काल से ही जलेबी स्वाद के मामले में इतनी लाजवाब मिठाई है कि 18वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन हसन अल-बगदादी ने उस समय के प्रसिद्ध व्यंजनों की एक कि़ताब लिखी थी. इसका नाम था अल-तबीख. इसमें पहली बार ज़ौलबिया यानी कि जलेबी का जि़क्र किया गया था. मध्यकाल में ये फारसी और तुर्की व्यापारियों के साथ भारत आई और इसे हमारे देश में भी बनाया जाने लगा. फारसी में इसे ज़ौलबिया कहते थे और भारत में आने के बाद इसे लोग जलेबी के नाम से बुलाने लगे. तो इस तरह फ़ारसी की ये प्रसिद्ध मिठाई कब भारतीय मिठाई बन गयी पता ही नहीं चला.
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