पश्चिम बंगाल की राजनीति उबाल पर है. 8 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और इनकम टैक्स द्वारा इंडियन लिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के कोलकाता ऑफिस और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा गया. खबर थी कि ये संस्था हवाला से लेन-देन कर रही है. छापे की खबर सुनकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं और जब्त दस्तावेज और हार्ड डिस्क साथ ले गईं. ED अधिकारियों ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी. ईडी की रेड के बाद बीजेपी ही नहीं CPI(M) और कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गिरफ्तारी की मांग की है. इसी के साथ राष्ट्रपति शासन की चर्चा तेज हो गई. ED पर कार्रवाई ने विपक्षी दलों को हमलावर होने का मौका दे दिया है. भाजपा ने इसे संघीय एजेंसी में बाधा करार दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग उठाई.
यह घटना 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई है, जब TMC और भाजपा के बीच जंग चरम पर है. अब सवाल यह उठता है कि क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? और क्या यह केंद्र की NDA सरकार के लिए माकूल मौका है कि वह अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाकर चुनाव कराए?
ED की रेड एक फर्जी सरकारी नौकरियों के घोटाले से जुड़ी बताई जा रही है. जांच के दौरान ED ने कोल स्कैम से जुड़े फंड्स को I-PAC तक ट्रेस किया, जो 2022 में कथित रूप से TMC के गोवा चुनाव कैंपेन के लिए इस्तेमाल हुए. IPAC के सह-संस्थापक प्रतीक जैन TMC के IT सेल हेड भी हैं, और ममता के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार भी. बिहार की जनसुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर ने ही इस संस्था की स्थापना की थी और ममता का पिछला कैंपेन वे ही संभाल रहे थे. ED का दावा है कि रेड के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत ममता ने हथिया लिए. ममता ने खुद फाइल्स और लैपटॉप ले लिए, जो वीडियो में कैद हो गया.
पहली बार नहीं है जब ममता केंद्रीय एजेंसियों से टकराई हैं. 2019 में CBI रेड के दौरान वह धरने पर बैठी थीं, और 2021 में चुनावी हिंसा के बाद राष्ट्रपति शासन की मांग उठी थी. लेकिन इस बार, चुनाव से ठीक पहले, यह घटना अधिक गंभीर लगती है. ED ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है.
विपक्ष ने ममता पर हमला तेज कर दिया. CPI(M) के मोहम्मद सलीम ने कहा कि ममता ने जैन को बचाया क्योंकि भ्रष्टाचार के सभी दस्तावेज उनके पास हैं. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि IPAC ने TMC के लिए धन उगाही की और चुनाव जीतने में साजिशपूर्ण मदद की. दोनों दलों ने ममता की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की. भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार का बचाव बताया. राष्ट्रपति शासन की मांग भी जोर पकड़ रही है. बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता ने संवैधानिक संकट पैदा किया है. यह मांग अनुच्छेद 356 पर आधारित है, जो राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल होने पर केंद्र को राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति देता है.
कानूनी और राजनीतिक पहलू क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? वर्तमान स्थिति से लगता है कि हां, लेकिन यह आसान नहीं है. ममता का हस्तक्षेप जांच में बाधा माना जा सकता है, जो IPC की धारा 186 के तहत अपराध है. ED PMLA की धारा 67 के तहत मजबूत है, जो जांच अधिकारियों को व्यापक शक्तियां देती है. अगर ED साबित कर दे कि ममता ने सबूत हटाए, तो गिरफ्तारी संभव है. लेकिन राज्य पुलिस ने ED अधिकारियों पर ही FIR दर्ज की है, जो संघीय तनाव बढ़ा रही है.
Article 365 of the Constitution के अनुसार यदि कोई राज्य सरकार केंद्र द्वारा दिए गए किसी विशिष्ट निर्देश का पालन करने में विफल रहती है (जिन मामलों पर संघ का अधिकार क्षेत्र है), तो राष्ट्रपति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है. यह अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने का एक अतिरिक्त और ठोस आधार प्रदान करता है.
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