देहरादून. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की फिर से मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रह रहकर सामने आ रही है. ऐसा लग रहा है कि मानों वे बार-बार तमाम मुद्दों के बहाने अपनी इस इच्छा को लोगों के सामने रख रहे हैं. उन्होंने एक पोस्ट साझा कर एक बार फिर उस इच्छा को उजागर किया है. इस पोस्ट में वे अपने सपने का जिक्र कर रहे हैं. मानों जैसे फिर से राज्या की बागडोर संभालना ही उनका सपना है और इच्छा भी.

रावत ने लिखा है कि ‘कल ईद की मुबारक देते-देते मुझे नींद आ गई। शायद मैंने जिन्हें सोने से पहले मुबारकबाद दी, उनको यह भी कहा कि रमजान की कड़ी तपस्या के बाद आपकी दुआओं को भगवान मंजूर करेगा, आपकी इच्छाएं पूरी करेगा. रात नींद में मुझे भी लगा कि कोई मेरी भी इच्छाओं को पूरी कर रहा है. मैं एक छोटी टोकरी लेकर अपने घर-गांव की धेलियों पर फूल देई-छम्मा देई कर रहा हूं. फिर धीरे-धीरे उसमें मेरी पोते-पोतियां, नाती-नातिनियों के चेहरे “फूल देई-छम्मा देई” कहते हुए उभरने लगे. फिर मैंने देखा कि मैं अपनी बहनों के लिए चैतोला लेकर के जा रहा हूं. जब मैं पहली बार रामनगर में अपनी दीदियों के लिए चैतोला लेकर के गया था, तो उसी का परिदृश्य मेरे मानस पटल पर आकृति लेने लगा. एक प्यार भरा एहसास ने मुझे घेर लिया.’

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पूर्व सीएम ने आगे लिखा कि ‘फिर मेरी बहुत सारी बहनें भी दिखाई देने लगीं. फिर मुझे अपनी मां का चित्र भी दिखाई देने लगा, जिससे मैं कह रहा हूं—मां, कि मेरी बहनें हैं, भोजन माताएं, आंगनवाड़ी, आशाएं, महिला सामाख्या की बहनें, महिला स्वयं सहायता समूह, महिला मंगल दल, कीर्तन मंडलियों की बहनें, यह वह बहनें हैं जिनके लिए मैं चैतोले के तौर पर बहुत कुछ कर सका, मगर अभी बहुत कुछ करना बाकी रह गया है, जिसको मैं पूरा होता देखना चाहता हूं. सिलसिला लंबा चल पड़ा, कई संघर्षरत उत्तराखंडी समूह उचक-उचक कर मेरे सामने आने लगे, इन सबको मिलाकर एक अधूरा और धुंधला सा चित्र मेरे उत्तराखंड का बनता हुआ दिखने लगा, यह वही चित्र बनता हुआ दिखाई दे रहा था जिस चित्र को मैंने उस समय से अपने मानस पटल पर बनाना शुरू कर दिया था, जब से राज्य आंदोलन में एक दर्दनाक, विभत्स मोड़ आया—गोलियां चलीं, महिलाओं के साथ दुष्व्यवहार हुआ आदि-आदि रोमहर्षक घटनाएं हैं.’

रावत ने लिखा कि ‘मैंने ठान ली थी कि अब राज्य बनना चाहिए और इसके साथ ही मैंने अपनी सोच, समझ, अनुभव और अध्ययन आधारित उत्तराखंड का नक्शा बनाना शुरू कर दिया था. इस नक्शे की लाइनें बनाते, गढ़ते न जाने मैंने कितनी बड़ी मात्रा में अपनी परिश्रम की स्याही और अनुभव के रंगों का उपयोग किया. मुझे अपनी भावनाओं की स्याही और अनुभव के रंग धुंधले पड़ते और गड़मड़ाते हुए दिखाई देने लगे, तो मैंने अपने आपसे कहा कि इसको ठीक करने का तुम्हें भी तो अवसर मिला था. इस सोच के मानस पटल पर उभरते ही मेरी आंखें खुल और मैं उठकर बैठ गया. अनेकानेक प्रकार की सोचों और कल्पनाओं में मैं उलझ गया. मन थोड़ा सा उद्गिन होता दिखा तो मैंने अपनी निद्राजन्य कल्पना के झंकारों को आपके साथ साझा करने का निर्णय लिया. नवरात्रि, ईद, चैत का महीना और फूल संक्रांति कि आप सबको बहुत-बहुत बधाई.’