लंकेश्वरी देवी करती हैं रावण की परिक्रमा, यहां अनोखे रूप से मनाया जाता है दशहरा, जानिए वजह …

पुरषोत्तम पात्र, गरियाबन्द। दशहरा का पर्व पूरे देश भर में धूमधाम से मनाया जा रहा है लेकिन गरियाबंद जिले के देवभोग का दशहरा अपने आप में अनोखा है. यहां पहले लंकेश्वरी देवी रावण की परिक्रमा करती हैं और कांदाडोंगर में रावण वध की सूचना पर ग्राम देवीयां खुशी मनाने जुटती है.

रामायण में रावण सेना के दो असुर खर व दूषण के देख रेख में चलने वाला दण्डाकारण्य इलाका बस्तर का एक बड़ा भाग आता था, उसी इलाके से महज 150 किमी दूरी पर बसे देवभोग इलाके में दंडाकरण्य का प्रभाव था. देवभोग व कांदाडोंगर में मनाए जाने वाले देव दशहरा की वर्षो पुरानी परम्परा इसी प्रभाव का नतीजा माना जाता है.

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देवभोग में रावण की परिक्रमा करती है लंकेश्वरी-

देवभोग के हृदय स्थल गांधी चौक में स्थित है माँ लंकेश्वरी देवी का मंदिर जो क्षेत्रवासीयों के लिए आस्था का केंद्र बिंदु है. साल में एक बार विजय दशमी के दिन देवी लंकेश्वरी का पट खुलता है. देवी का एक स्थान बरही ग्राम में भी मौजूद है. इस देव स्थल का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना है. लंका विजय के बाद आंध्रप्रदेश व दण्डकारण्य में लंकेश्वरी देवी का पूजन हो रहा था. दण्डाकारण्य प्रभावित इलाका होने के कारण जमींदार लाल नागेंद्र शाह के परिवार ने इस देवी की स्थापना पहले बरही में फिर देवभोग में किया. पूजन मनन की जवाबदारी दाऊ परिवार को सौपा गया. आज दाऊ परिवार की तीसरी पीढ़ी जय शंकर दाऊ इस देवी के पुजारी हैं. दशहरा में स्थानीय ग्राम देवियों के पूजन के साथ ही माँ लंकेश्वरी की भी पूजा इसी दिन होती है. देवी लंका की है इसलिए दहन के लिए खड़े रावण के पूतला की जब तक परिक्रमा नहीं कर लेती तब तक रावण का दहन नहीं किया जाता.

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कांदाडोंगर में जुटती है 84 गांव की देवी, विजय जश्न के बाद ही होता है रावण पुतला का दहन- विजयदशमी के दिन रावण के वध के साथ ही समूचे प्रभावित इलाके में असुरों का आतंक खत्म हुआ था. रावण के राजपाठ में दण्डाकारण्य में निवास देव व ऋषि आतंकित थे. रावण वध के बाद इलाके के 84 गांव की देवी कांदाडोंगर के नीचे जुट कर विजय पर्व मनाया था. कांदाडोंगर में मां कूलेश्वरीन यानी मां पार्वती के रूप का वास है. सभी ग्राम देवियों का नेतृत्व वही करती थी इसलिए देवी जुटती है. सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा आज भी जीवित है. कहा जाता है शुरूआती वर्षो में केवल देवी जुटती रही फिर धीरे से पुजारी पटेल, फिर ग्राम प्रमुखो की आवाजाही हुई. समय के साथ स्वरूप बदला तो इलाके ही नहीं दूर दराज से इस अनूठे दशहरे को देखने हजारों की तादात में कांदाडोंगर के नीचे भीड़ जुटती है.

सोनपत्ता भेंट कर देते है बधाई-

कांदाडोंगर में जुटी देवियों की भीड़ देव् वाद्य के ताल पर जम कर झूमती हैं. शौर्य प्रदर्शन व पताका मिंलन कांदाडोंगर दशहरा का मुख्य आकर्षण केंद्र होता है. पताका मिलन के बाद सभी श्रद्धालु एक दूसरे को सोन पत्ता भेंट कर पर्व की बधाई देते हैं. देव मिलन से लौट कर ही रावण दहन का रिवाज भी वर्षो पुराना है.

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