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रायपुर. निर्धनता के कारण दान नहीं करने को लेकर हमारे ग्रंथो में कहा गया है, किंतु एक निर्धन सोचता है कि जब उसके पास ही नहीं है तो दान कैसे करें. किंतु बिना दान दिए तो निर्धनता दूर नहीं हो सकती. कहा भी गया है कि – अदत् दानात् च भवेत् दरिद्रो दारिद्र्य दोषेण करोति पापम्पा पप्रभावात् नरकं प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी. इसी प्रकार से अन्न को ब्रह्मा और जल को विष्णु की संज्ञा दी गई है.

अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुः स्कन्दपुराण के अनुसार अन्न ही ब्रह्मा है और सबके प्राण अन्न मे ही प्रतिष्ठित हैं. अन्नं ब्रह्म इति प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः

अतः स्पष्ट है कि अन्न ही जीवन का प्रमुख आधार है. इसलिए शास्त्रों मे अन्नदान तो प्राणदान के समान है. अन्नदान को सर्वश्रेष्ठ एवं प्रभूत पुण्यदायक माना गया है. यह धर्म का प्रमुख अंग है. अन्नदान के बिना कोई भी जप, तप या यज्ञ आदि पूर्ण नहीं होता है. जो व्यक्ति प्रतिदिन विधिपूर्वक अन्नदान करता है. वह संसार के समस्त फल प्राप्त कर लेता है. अन्नदान की कई विधियां हैं जैसे – भूखे व्यक्ति को भोजन कराना या पशु-पक्षियों को चारा-दाना देना या व्रत या त्योहार आदि में भोजन कराना या तीर्थस्थलों मे भिक्षुकों को भोजन कराना आदि. पके हुए अन्न अर्थात् भोजन का दान करना अधिक श्रेयस्कर होता है. अपनी सामर्थ्य एवं सुविधा के अनुसार कुछ न कुछ अन्नदान अवश्य करना चाहिए. इससे परम कल्याण की प्राप्ति होती है.

जब किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि के क्षेत्र में चन्द्रमा स्थित हो और शनि से दृष्ट भी हो अथवा शनि व मंगल दृष्ट हो तो जातक विरक्ति का जीवन व्यतीत करता है. परंतु इसके बाद भी संसार में ख्याति प्राप्त करता है. जब किसी व्यक्ति के लग्न, तीसरे, अष्टम या भाग्य स्थान में शनि तथा उस पर गुरू की किसी भी प्रकार से दृष्टि हो तो ऐसे लोग भोग विलास से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन बिताते हैं. साथ ही यहीं ग्रह योग उन्हें जीवन में सफलता तथा मान भी प्रदान करता है. अतः किसी व्यक्ति को जीवन में सफलता के साथ मान भी प्राप्त करना हो तो अपने जीवन में सादगी तथा अनुशासन का पालन करना चाहिए और शनि तथा गुरू की शांति के साथ मंत्रजाप एवं दान करना चाहिए.