सतीश दुबे,डबरा (ग्वालियर)। कहते हैं कि संकट की घड़ी में लिया गया एक सही फैसला किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला आज डबरा रेलवे स्टेशन पर, जब गाड़ी संख्या 12617 मंगला एक्सप्रेस में यात्रा कर रही एक गर्भवती महिला को अचानक तेज़ प्रसव पीड़ा उठी। हालात ऐसे थे कि ट्रेन चलती रहती तो माँ और नवजात—दोनों की जान पर बन सकती थी। लेकिन रेलवे के डिप्टी कंट्रोलर, रेल सुरक्षा बल और डॉक्टरों की सूझबूझ, संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई ने एक संभावित त्रासदी को खुशियों में बदल दिया। ट्रेन को मेन लाइन पर रुकवाया गया, बिना एक पल गंवाए महिला को अस्पताल पहुंचाया गया और कुछ ही देर में एक स्वस्थ शिशु ने जन्म लिया। यह कहानी सिर्फ एक प्रसव की नहीं, बल्कि सिस्टम के मानवीय चेहरे की मिसाल है।
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जानकारी के अनुसार आज दिनांक 06.01.2025 को मंगला एक्सप्रेस के जनरल कोच में यात्रा कर रही महिला यात्री मंजेश पति पवन विश्वकर्मा को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डिप्टी कंट्रोलर झांसी ने तत्काल स्टेशन मास्टर डबरा को सूचित किया इसके बाद स्टेशन प्रबंधक द्वारा वॉकी-टॉकी के माध्यम से लोको पायलट से संपर्क कर ट्रेन को डबरा स्टेशन की मेन लाइन पर रुकवाया। उद्घोषणा के जरिए आरपीएफ को सूचित किया गया।
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आरपीएफ के सहायक उप निरीक्षक गिरिजेश कुमार, प्रधान आरक्षक दीपक कुमार, आरक्षक धर्मवीर सिंह एवं महिला आरक्षक नीतू रावत ने तत्परता दिखाते हुए महिला को सुरक्षित रूप से ट्रेन से उतारा। एंबुलेंस की प्रतीक्षा किए बिना निजी संसाधन से महिला को तत्काल सिविल हॉस्पिटल डबरा पहुंचाया गया। वहाँ डॉक्टर स्वाति अग्रवाल और नर्सिंग स्टाफ अर्चना ने महिला को अटेंड किया। डॉक्टरों के अनुसार बच्चे के गले में नाल फंसी हुई थी और समय पर अस्पताल न पहुंचने की स्थिति में माँ-बच्चे की जान को गंभीर खतरा हो सकता था। लेकिन समय रहते उपचार मिलने से सुबह 10 बजकर 56 मिनट पर महिला ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। फिलहाल माँ और बच्चा दोनों पूर्णतः स्वस्थ हैं।
महिला यात्री मंजेश, निवासी ग्राम रामनगर पोस्ट सैमरा, तहसील मेहगांव, जिला भिंड, अपने पति पवन विश्वकर्मा के साथ कल्याण से ग्वालियर की यात्रा कर रही थीं। उनके पति के पैर में एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर लगा हुआ था। इस पूरे घटनाक्रम में रेल सुरक्षा बल की संवेदनशीलता और सक्रियता सराहनीय रही। डबरा स्टेशन पर आज सिर्फ एक ट्रेन नहीं रुकी, बल्कि वक्त भी ठहर गया और उसी ठहरे हुए वक्त में एक नई ज़िंदगी ने जन्म लिया। यह कहानी भरोसे की है, ज़िम्मेदारी की है और मानवता की जीत की है।
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