India Germany Submarine Deal: भारत में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रहा है. भारत और जर्मनी एक बड़ी 8 अरब डॉलर की पनडुब्बी डील के करीब हैं. अगर ये डील होती है तो भारत में पनडुब्बियों का निर्माण होगा. भारत लगातार समंदर में अपनी ताकत को और बढ़ाने में जुटा हुआ है. इसे लेकर जल्द ही भारत और जर्मनी के बीच 8 अरब डॉलर के पनडुब्बी निर्माण डील को अंतिम रूप दिया जा सकता है. भारत के लिए इसे अब तक का सबसे बड़ा डिफेंस डील माना जा रहा है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर 12 और 13 जनवरी को भारत दौरे पर आएंगे. उससे पहले इस डिफेंस डील में पहली बार पनडुब्बी के निर्माण के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर जर्मनी के साथ डील पक्की हो जाती है तो भारत फ्रांस से लेने वाले तीन और पनडुब्बी खरीदने की योजना रद्द कर देगा. भारत का यह कदम रूस के लिए भी झटके की तरह होगा. जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स जीएमबीएच और भारत की सरकारी स्वामित्व वाली मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड मिलकर इन पनडुब्बियों का निर्माण करेगी.

भारतीय नौसेना के पास फिलहाल लगभग 12 पुरानी रूसी की और 6 नई फ्रांस की पनडुब्बियां हैं. जर्मन टेक्नोलॉजी वाली पनडुब्बी में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम लगा होगा. इस सिस्टम से पनडुब्बियों की क्षमता बढ़ जाती है और वह ज्यादा देर तक पानी के अंदर रह सकती है. यह सबमरीन हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की निगरानी क्षमता बढ़ाएंगी क्योंकि इस क्षेत्र में चीन भी अपना दबदबा बनाने की जुगत में लगा है. जर्मन सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया कि भारत की अपनी पहली यात्रा पर आए फ्रेडरिक मर्ज सोमवार (12 जनवरी 2026) को गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात करेंगे और फिर बेंगलुरु जाकर वहां की जर्मन कंपनियों से मिलेंगे. दोनों देश दवा क्षेत्र के साथ-साथ डिफेंस के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाना चाहते हैं. फ्रेडरिक मर्ज और पीएम मोदी यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर भी बातचीत होनी है.

थायसेंक्रुप मरीन सिस्टम्स के प्रवक्ता ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. वहीं भारत के रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने भी तुरंत कोई जवाब नहीं दिया. यह डील भारत और जर्मनी के बीच रक्षा संबंधों को और मजबूत करने का संकेत देती है और इसके पीछे कई कारण हैं. भारत लंबे समय से ग्लोबल डिफेंस कंपनियों को भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए प्रोत्साहित कर रहा है ताकि देश के भीतर हथियारों का उत्पादन हो सके.

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