Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। देश के कई राज्यों में मां कालरात्रि को समर्पित भव्य और प्राचीन मंदिर स्थापित हैं, जिनका ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक महत्व है। ऐसा ही मंदिर (Maa Skandamata Temple, Varanasi) उत्तर प्रदेश में भी है, जो कि मां भगवती के सातवे स्वरूप मां कालरात्रि को ही समर्पित है।
वाराणसी का गुप्त मंदिर
मां का ये मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गोदौलिया चौक से महज चंद कदमों की दूर पर है। जिसे काशीराज काली मंदिर (Kashiraj Kali Temple) के नाम से जाना जाता है। काशी नरेश द्वारा निर्मित 200 सौ साल पुरानी संपत्ति, शाही परिवार की निजी मंदिर थी। इस मंदिर को वाराणसी का गुप्त मंदिर भी कहा जाता है। काशी के प्रसिद्ध मंदिरों जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर की तुलना में इसका प्रचार कम हुआ है, इसलिए यह आम भक्तों की नजर से “गुप्त” ही रहा। यह मंदिर वाराणसी में सामान्य रास्तों से थोड़ा अलग और संकरे गलियों में स्थित है, इसलिए बहुत से लोगों को इसका सही स्थान पता नहीं होता।

इस मंदिर का निर्माण पूरी तरह से पत्थर की मदद से किया गया है, जो रथ के आकार में बना है। मंदिर की दीवारों और खंभों पर तराशी गई पत्थर की पंखुड़ियां, घंटियां और अंगूठियां उस समय भी भारत की अत्यधिक विकसित पत्थर की कला के ठोस सबूत हैं। यहां बने डिजाइन से लेकर नक्काशी की बारीकी तक, सब कुछ इतना सटीक है कि यह कल्पना करना मुश्किल है कि उन्होंने उस समय जब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी तब बिना किसी आधुनिक उपकरण के इसे कैसे तराशा होगा।
READ MORE: ऐसा मंदिर जो बना स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र, अंग्रेजों का सिर काटकर देवी को चढ़ाते थे क्रांतिकारी बंधु सिंह, माता ने दिखाया था ऐसा चमत्कार
नवरात्र के सातवें दिन उमड़ती है भक्तों की भीड़
वाराणसी में यह शायद सबसे आसानी से पहुँचा जा सकने वाला स्थान है, लेकिन साथ ही साथ इसे ढूँढना भी सबसे मुश्किल है। यहाँ आने वाले अधिकांश लोगों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि वे केवल जिज्ञासावश ही यहाँ आ गए थे। यहाँ आने वाले लोगों ने इस स्थान को अराजकता के बीच शांति का नखलिस्तान बताया है। जिसके कारण भी इसे गुप्त मंदिर कहा जाता है। नवरात्र के सातवें दिन मंदिर में भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में जो मंदिर दिख रहा है वह नकली है, जो अपने बगल में असली मंदिर को छिपाए हुए है। इसके बारे में कई किंवदंतियां हैं, कहा जाता है कि जब भी राजमिस्त्री मूल मंदिर में फर्श या गुंबद जोड़ने की कोशिश करते थे तो दीवारें जमीन में धंस जाती थीं। उन्होंने कई बार गुंबद को जोड़ने की कोशिश की गई, लेकिन वे असफल रहे। इसलिए उन्होंने इसे वैसे ही छोड़ने और इसके ठीक सामने एक और गुंबद बनाने का फैसला किया।

एक अन्य कथा है कि वर्तमान पुजारी परिवार की पांच पीढ़ी पहले दामोदर झा भगवती के साधक थे। साल 1840 में तीर्थाटन करते हुए वे रामनगर पहुंचे। यहां पर सूखा पड़ा हुआ था। तत्कालीन महाराज ईश्वरी नारायण सिंह से लोगों ने भगवती साधक के नगर में आने की सूचना दी।व्यथा-कथा सुनने पर पं. दामोदर झा ने बारिश होने का भरोसा तो दिया ही साथ ही समय भी बता दिया। उनके बताए मुताबिक बारिश भी हो गई। इससे प्रभावित हुए महाराज ने उत्तराधिकारी से संबंधित अपनी चिंता साधक को बताई। इस पर उन्होंने कहा कि-घर में पता करिए संतान है। पूछताछ करने पर पता चला कि छोटे भाई की पत्नी गर्भ से हैं।
READ MORE: साल में एक बार नवरात्र के पांचवे दिन खुलता है मां बागेश्वरी का ये मंदिर, यहीं किया था देवासुर का वध, काशी की मानी जाती हैं रक्षक
गर्भगृह के बीच भगवती काली की प्रतिमा विराजमान
इससे महराज इतना प्रभावित हो गए कि उन्होंने भगवती साधक को रामनगर में ही ठहर जाने का आग्रह किया। जिसके बाद देवी साधक को गोदौलिया पर पहले से बन रहे मंदिर में ठहराया गया। परिवार में बालक का जन्म होने के बाद मंदिर में भगवती की स्थापना की गई। फिलहाल दामोदर झा की पांचवीं पीढ़ी के पं. अमरनाथ झा मंदिर में पूजन अर्चन करते हैं। दर्शन पूजन के लिए राज परिवार के लोग अभी भी यहां आते हैं। गर्भगृह के बीच भगवती काली की प्रतिमा विराजमान है। इसके अलावा गर्भगृह के अंदर शिवलिंग भी स्थापित है। भगवान गणेश को लालाटबिंब पर स्थापित किया गया है। गर्भगृह में तीन दरवाजे हैं, लेकिन केवल दाईं ओर का दरवाजा ही खोला जा सकता है। गर्भगृह के दाहिने प्रवेश द्वार के बाहर भगवान शिव का वाहन नंदी है।

शिवपरिवार समेत नंदी भी विराजमान
गर्भगृह के दोनों ओर दो गोमुख मौजूद हैं, जिनके माध्यम से अनुष्ठानों के दौरान चढ़ाया जाने वाला दूध, पानी गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। गर्भगृह के पीछे बाईं ओर मौजूद भित्तिस्तंभ के निचले हिस्से पर एक टूटा हुआ कीर्तिमुख मौजूद है। इस मंदिर में पंचदेव की स्थापना के साथ ही शिवपरिवार समेत नंदी को भी विराजमान कराया गया था। निर्माण से संबंधित शिलापट्ट भी परिसर में आज भी हैं। कहा जाता है इसके एक-एक स्तंभ बनाने में 6 मीने का समय लगा था।
मंदिर से जुड़ी जनश्रुति
अन्य श्रुतियों के अनुसार राजा शिवलिंग को सुरक्षित रखने के लिए आक्रमणकारियों से असली मंदिर को छिपाना चाहते थे। इसलिए, उन्होंने असली शिवलिंग को एक छोटे से कमरे में रखने का फैसला किया और उसके ठीक सामने एक विस्तृत कलाकृति बनवाई। जो कोई भी यहां आता है, वो शायद ही दूसरे मंदिर पर ध्यान देता हो। इसके पीछे छोटा सफेद मंदिर है जो गौतमेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।
हिंदी और संस्कृत में लिखे शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण तत्कालीन राजा प्रभु नारायण सिंह की मां ने संवत् 1843, फालफुन सादी 5, रविवार को करवाया था। मंदिर में पिछले कई वर्षों में कई जीर्णोद्धार हुए हैं, इसके बाद भी मंदिर अपने प्राचीन आकर्षण और भव्यता को बरकरार रखे हुए है। चूंकि काशीराज काली मंदिर, काशी नरेश (राजा) की निजी संपत्ति है लिहाजा बिना अनुमति के यहां पर घूमना या पुलिस से लिखित अनुमति के बिना व्यावसायिक सैर करना दंडनीय अपराध है।
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें

